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Code : 184544
Date of publication : 11/12/2016 17:57
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फ़ार्स खाड़ी सहयोग परिषद ने किया ईरान के ख़िलाफ़ सैन्य सहयोग का फ़ैसला।

लंदन और फ़ार्स खाड़ी सहयोग परिषद पीजीसीसी ने अपनी हालिया बैठक में सैन्य सहयोग करने का फ़ैसला किया है।

विलायत पोर्टलः लंदन और फ़ार्स खाड़ी सहयोग परिषद पीजीसीसी ने अपनी हालिया बैठक में सैन्य सहयोग करने का फ़ैसला किया है। यह सहयोग और सैन्य उपस्थिति नया विषय नहीं है, लेकिन यह बैठक क्षेत्रीय व ब्रितानी मीडिया हल्क़ों के ध्यान का केन्द्र क्यों बनी हुयी है, इसका जवाब कुछ हद तक मनामा बैठक के घोषणापत्र से मिल सकता है। इस घोषणापत्र में ईरान पर क्षेत्रीय देशों के मामलों में हस्तक्षेप का आरोप लगाया गया है। फ़ार्स खाड़ी सहयोग परिषद वर्षों से अपने मुख्य घोषणापत्रों में ईरान के ख़िलाफ़ निराधार दावे दोहराती रही है। इस बार भी ऐसा ही हुआ इस फ़र्क़ के साथ इस बार इस बयान में लंदन की ओर से उस चीज़ के ख़िलाफ़ मदद को शामिल किया गया है जिसे ब्रितानी प्रधान मंत्री ट्रेसा मे ने ईरान की आक्रमक क्षेत्रीय कार्यवाही का नाम दिया है। साफ़ सी बात है कि इस मदद के पीछे ब्रिटेन का लक्ष्य फ़ार्स खाड़ी में फिर से सैन्य उपस्थिति की पृष्ठिभूमि बनाना है। ट्रेसा मे पहली ब्रितानी प्रधान मंत्री हैं जिन्होंने फ़ार्स खाड़ी सहयोग परिषद की बैठक में हिस्सा लिया और रक्षा क्षेत्र में पूंजि निवेश व सैन्य शिक्षा के ज़रिए सुरक्षा मज़बूत करने के लिए सहयोग का प्रस्ताव दिया। बहरैन जिसने फ़ार्स खाड़ी सहयोग परिषद बैठक की मेज़बानी की है, राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धाओं के प्रभाव में 2011 से सऊदी अरब की मदद से अपने यहां जनक्रान्ति का दमन कर रहा है। इस आधार पर सऊदी अरब और बहरैन व संयुक्त अरब इमारात जैसे देशों ने जो बहुत हद तक सऊदी अरब के प्रभाव में हैं, इस ख़तरनाक रास्ते पर जाने का ख़र्च पहले से स्वीकार कर लिया है। शायद इस तरफ़ जाने की एक वजह यह है कि ख़ुद को क्षेत्रीय खेल में हारा हुए खिलाड़ी समझते हैं। इसलिए इस बार उस बंद गली से निकलने का एक एकमात्र रास्ता कि जिसे ख़ुद पैदा किया है, इस बार ब्रिटेन के दिशा निर्देश पर क्षेत्र में संकट पैदा करने में देख रहे रहे हैं।
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तेहरान रेडियो


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