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Date of publication : 22/9/2016 14:16
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अब्बासी दौर में शियों के हालात।

पतन की ओर बढ़ रहे अमवी शासन के अंतिम दौर में पैग़म्बर स.अ के अहलेबैत अ. और शियों के लिए हालात अच्छे थे वही स्थिति अब्बासी शासन के शुरूआती दिनों में अबुल-अब्बास के शासनकाल में भी थी और शियों ने भी अहलेबैत (अ.) की शिक्षाओं अर्थात वास्तविक इस्लाम के प्रसार व प्रचार में बहुत ज़्यादा कोशिश की



विलायत पोर्टलः अबुल अब्बास सफ़्फ़ाह (1) की हुकूमत द्वारा 132 हिजरी में अब्बासी शासनकाल की शुरूआत हुई। 139 हिजरी में सफ़्फ़ाह की मौत हुई। उसके शासनकाल का ज़्यादा हिस्सा, अब्बासी शासन को मज़बूत बनाने और अमवियों के साथ जंग में गुज़रा।
(1) अबुल अब्बास, अब्दुल्लाह इब्ने मुहम्मद इब्ने अली इब्ने अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास, चूँकि वह अपने विरोधियों के क़त्ल का बहुत जल्दी फ़ैसला लिया करता था और शासन करने तथा हुकूमत को मज़बूत करने के लिए उसने बहुत से अमवियों का ख़ून बहाया इसलिए सफ़्फ़ाह (प्राणघातक) के नाम से मशहूर हो गया।सफ़्फ़ाह के शासन काल में घटित होने वाली घटनाओं की जानकारी के लिए तारीख़े तबरी भाग 5 पृष्ठ123-145  तारीख़े इब्ने असीर भाग 3 पृष्ठ 483-520, तारीख़े याक़ूबी भाग 3 पृष्ठ 278-398 तारीख़ुल ख़ुल्फ़ा पृष्ठ 256-359 अल-इमामः वस्सियासः ، भाग 2 पृष्ठ 118-133 को पढ़ें।इसी आधार पर तथा इसलिए भी कि बनी उमय्या के विरूद्ध विद्रोह के समय अब्बासियों का नारा ”अहलेबैत (अ.) के ख़ून का बदला लेना" था अब्बासी शासकों ने आरम्भिक वर्षों में इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) और शियों के प्रति कोई मुश्किल खड़ी नहीं की। इस तरह इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) और आपके  सहाबियों के लिए सासंकृतिक व धार्मिक गतिविधियों के लिए राजनीतिक परिस्थितियां अनुकूल थीं।दूसरे शब्दों में जिस तरह पतन की ओर बढ़ रहे अमवी शासन के अंतिम दौर में पैग़म्बर स.अ के अहलेबैत अ. और शियों के लिए हालात अच्छे थे वही स्थिति अब्बासी शासन के शुरूआती दिनों में अबुल-अब्बास के शासनकाल में भी थी और शियों ने भी अहलेबैत (अ.) की शिक्षाओं अर्थात वास्तविक इस्लाम के प्रसार व प्रचार में बहुत ज़्यादा कोशिश की। अल्लामा सय्यद मोहसिन अमीन इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) के हाथों ज्ञान व शिक्षा के बड़े पैमाने पर प्रचार, रसूले इस्लाम स.अ. से हदीस बयान करने वाले रावियों की बड़ी संख्या और विभिन्न इस्लामी शिक्षाओं में बड़े पैमाने पर आपके शिष्यों की मौजूदगी की ओर इशारा करने के बाद कहते हैं "इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) द्वारा ज्ञान के बहुत ज़्यादा प्रसार और बड़े पैमाने पर आपके शिष्यों का कारण यह है कि आप बनी उमय्या के अंतिम और बनी अब्बास के आरम्भिक दौर में जिंदगी जी रहे थे। उस ज़माने में बनी उमय्या पतन की ओर अग्रसर थे इसलिए तक़य्या (2) का माहौल नहीं था और बनी अब्बास अपने आरम्भिक ज़माने में अबू तालिब अ. के परिवार से किसी तरह की दुश्मनी या ईर्ष्या नहीं रखते थे और चूँकि अपने शासन को हाशिमी शासन कहते थे इसलिए इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) जैसी महान हस्ती को अपने लिए गर्व समझते थे।(2) तक़य्ये का मतलब होता है छुपाना और दीन की परिभाषा में किसी ख़ास बात के कारण अपनी आस्था, विश्वास या किसी काम को अपनी दिली इच्छा के विपरीत अंजाम देना।  (आयानुश्शिया भाग 1 पेज 664)इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) के समय में राजनीतिक हालात अलग तरह के थे और इन परिस्थितियों में ज्ञानात्मक व सांस्कृतिक क्रांति चलाने में कोई विशेष कठिनाई नहीं थी इसके अतिरिक्त उस समय की इस्लामी दुनिया के समाजिक और बौद्धिक हालात भी ज्ञानात्मक बहस और चर्चा की मांग कर रहे थे और इसका कारण यह था कि इस्लामी दुनिया में विभिन्न समुदाय और विभिन्न बौद्धिक व धार्मिक दृष्टिकोण पाए जाते थे यह विभिन्न रुझान सभी तरह की इस्लामी शिक्षाओं पर आधारित थे।(उस्ताद शहीद मुतह्हरी की किताब "सैरी दर सीरए-अइम्मा-ए-अतहार पेज 142-147 देखें।) मंसूर अब्बासी के सिंहासन पर बैठने के साथ ही हालात बदल गए। मंसूर अब्बासी ने 137 हिजरी में सत्ता हाथ में लेने के बाद सबसे पहला काम यह किया कि अब्बासियों को हुकूमत तक पहुंचाने में बहुत ज़्यादा मदद करने वाले अबू मुस्लिम ख़ुरासानी को क़त्ल कर दिया। मंसूर के शासन का सिलसिला 158 हिजरी तक जारी रहा। विरोधियों के बारे में उसकी राजनीति क़त्ल, डराना, धमकाना, क़ैद व बंद में रखने पर आधारित थी और अपने विरोधियों से निपटने के लिए वह किसी भी तरह के अत्याचार या उत्पीड़न से दूरी नहीं करता था। समय गुज़रने के साथ साथ चूँकि लोगों को बनी अब्बास के "अहलेबैत (अ.) के ख़ून का बदला" लेने का पर आधारित झूठे नारे की सच्चाई का पता चल गया था और यह बात सभी पर स्पष्ट हो गई थी कि मुसलमानों पर हुकूमत करने के अतिरिक्त उनका और कोई उद्देश्य नहीं है इसलिए अब्बासी शासन के विरूद्ध अलवियों ने विरोध करना शुरू कर दिया। अब्बासी शासन के कुछ राजाओं ने ऐसे विरोधों को कुचलने के लिए बल प्रयोग, यातना व सख़्ती, क़ैद व बंद और अलवियों के क़त्ल का सहारा लिया और अलवियों पर अत्याचार व हिंसा में बनी उमय्या से आगे निकल गए। मंसूर अलवियों के साथ बड़ी निर्दयता के साथ व्यवहार करता था उसने बहुत से लोगों को बहुत बुरी तरह जेलों में भर रखा था, जेल ऐसे थे जिन में दिन और रात के समय का भी पता नहीं चल पाता था। बंदी क़ुरआन पढ़ कर, नमाज़ का समय सेट करते थे अगर जेल में किसी की मौत हो जाती तो उसकी लाश जेल में ही छोड़ दी जाती ताकि सड़कर बदबू फैल जाए और बंदी तरह तरह की बीमारियों में ग्रस्त होकर दुनिया से कूच कर जाएं कभी बंदियों पर जेल गिराने करने का आदेश दे दिया जाता और बंदी उसी के मलबे में दब कर शहीद हो जाते। (अल-इमाम अल-सादिक़ व वल मज़ाहिबुल अरबआ भाग 12 पेज 475)मंसूर के दौर में अब्दुल्लाह इब्ने हसन की संतानों में से मुहम्मद और इब्राहीम ने उसकी अत्याचारी हुकूमत के विरूद्ध आंदोलन किया लेकिन त्याग व साहस से परिपूर्ण ज़बरदस्त जंग के बाद मंसूर के सैनिकों के हाथों शहीद हुए।(तारीख़े इब्ने असीर भाग 3 पेज 563-590)मंसूर इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) पर भी बहुत ज़्यादा कंट्रोल रखता था और थोड़े थोड़े अंतराल के बाद दरबार में बुलाता और आपको क़त्ल करने का इरादा करता था लेकिन हर बार अल्लाह की कृपा से चमत्कारिक रूप से इमाम मंसूर के षड़यंत्र से बच जाते थे अनंततः मंसूर ने ज़हर द्वारा आपको शहीद कर दिया।(अल-फ़ुसूलुल मुहिम्मा पेज 222-223, अल-इमाम सादिक़ वल मज़ाहिबुल अरबआ भाग 1 व 2 पेज 471-475 तारीख़ुश्शिया पेज 45-46)इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) की शहादत के बाद आपके उत्तराधिकारी के मुद्दे पर शियों में मतभेद हो गया और इस मतभेद के नतीजे में विभिन्न समुदाय वुजूद में आ गए जिनमें से एक इस्माईलिया समुदाय भी था। लेकिन इसना अशरी शियों ने तार्किक सबूतों और हदीसों के आधार पर इमाम मूसा काज़िम (अ.) की इमामत को स्वीकार किया। इस बारे में शेख़ मुफ़ीद लिखते हैं :”अबू अब्दुल्लाह के बाद आपके बेटे अब्दे सालेह अबू हसन मूसा इब्ने जाफ़र (अ.) इमाम थे चूंकि  आपकी में इमामत के लिए ज़रूरी विशेषताएं मौजूद थीं और आपके वालिद ने आप ही को इमाम नियुक्त किया था“।
(अल-इरशाद भाग 2 पेज 215)
इमाम मूसा काज़िम (अ.) की इमामत की अवधि पैंतीस साल थी (148-183 हिजरी) इस बीच आपका चार अब्बासी खलीफ़ाओं मंसूर, महदी, हादी, हारूनुर रशीद से सामना रहा।अलवियों पर अत्याचार व हिंसा के बारे में इन ख़लीफ़ाओं की शैली भी मंसूर की तरह थी। अब्बासी शासकों के डर के कारण माहौल में ऐसी घुटन थी कि शिया, इमाम मूसा काज़िम अ. की हदीसें बयान करते हुए बहुत कम आपका नाम ज़बान पर लाते थे। नाम के बजाए अधिकतर आपकी उपाधि अबुल हसन, अबू इब्राहीम या अब्दुस्सालेह अल-आलिम जैसे उपाधियों का इस्तेमाल करके आपके हवाले से हदीस बयान करते थे। हारूनुर रशीद ने अपने ज़माने में आपको जेल में डाल दिया और लगातार एक जेल से दूसरे  जेल में स्थांनतिरित करता रहता था यहाँ तक कि 183 हिजरी में सिंदी इब्ने शाहक के हाथों बग़दाद जेल में आपकी शहादत हुई। इमाम मूसा काज़िम अ. की परदेस में मज़लूमाना शहादत से हारूनुर रशीद की हुकूमत के विरूद्ध बग़दाद के शियों का क्रोध व ग़ुस्सा भड़क उठा।तारीख़ुश्शिया पेज 48, आयानुश्शिया भाग 2 पेज 11-12)यद्धपि इमाम मूसा काज़िम (अ.) के ज़माने में अब्बासी शासक अपने विरोधियों विशेष कर अलवियों के साथ अत्याचार, हिंसा और तानाशाही की नीति अपनाए हुए थे लेकिन इसके बावजूद विभिन्न धार्मिक संप्रदायों तथा विभिन्न बौद्धिक एंव वैचारिक रुझानों के कारण हुकूमत धार्मिक व सांस्कृतिक गतिविधियों और आंदोलनों को पूरी तरह से कंट्रोल नहीं कर सकती थी और न ही अपनी इच्छानुसार उसका सेंसर कर सकती थी। इसी लिए इमाम मूसा काज़िम (अ.) सारी मुश्किलों के बावजूद इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.) व इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) के हाथों शुरू होने वाली इल्मी व सांस्कृतिक क्रांति को जारी रखने में सफल रहे, आपने बड़े बड़े शिष्यों का प्रशिक्षण किया और बहुत से रावियों ने आपसे रिवायतें बयान की हैं। शेख़ तूसी (र.ह) ने अपनी किताब रेजाल में इमाम मूसा काज़िम (अ.) से रिवायतें बयान करने वाले रावियों की संख्या 262 बयान की है।(रेजाल  शेख़ तूसी (र.ह) इमाम काज़िम (अ.) के असहाब) लेकिन कुछ लेखकों की रिसर्च के अनुसार आपसे रिवायत करने वालों की संख्या इससे ज़्यादा है और इस रिसर्च के अनुसार इमाम मूसा काज़िम (अ.) से हदीसें बयान करने वालों की संख्या 638 है ।(मुसनद अल-इमाम अल-काज़िम (अ.) शेख़ अज़ीज़ुल्लाह अतारदी, बुहूसुन फ़िल मेलले वन्नहेल भाग 6 पेज 489)इमाम मूसा काज़िम (अ.) की शहादत के बाद शियों का एक गुट आपकी शहादत और आपके बाद इमामत के बारे में भ्रम व विमुखता का शिकार हो गया। कुछ लोगों का विचार था कि आप ही महदी-ए-मौऊद हैं। कुछ ने आपकी मौत और शहादत का ही इंकार कर दिया कुछ ने शहादत को स्वीकार तो किया लेकिन इस बात के पर विश्वास कर लिया कि आप दोबारा आएंगे और दुनिया को पूरी तरह से न्याय, निष्पक्षता व इंसाफ़ से भर देंगे। इस गुट को "वाक़ेफ़ीया" कहा जाता है अर्थात इमाम मूसा काज़िम अ. की इमामत के बाद रूक जाने वाले। यह लोग आपके बाद आपके वंश में इमामत का सिलसिला जारी रहने को नहीं मानते थे लेकिन शियों के बहुमत ने इमाम अली इब्ने मूसा रेज़ा अ. की इमामत ही को माना और उन्हें "क़तईयः" कहा जाने लगा अर्थात वह लोग जो इमाम अली रेज़ा अ. की इमामत पर पूरी तरह से विश्वास रखते हैं।(फिरक़ुश्शिया पेज 90-91) इमाम मूसा काज़िम (अ.) की शहादत से इमाम अली रेज़ा अ. की इमामत शुरू हुई और 203 हिजरी में आपकी शहादत तक आपकी इमामत का सिलसिला जारी रही। आपकी इमामत की अवधि बीस साल थी आपके दौर में हारूनुर रशीद, मुहम्मद अमीन, और अब्दुल्लाह मामून, अब्बासी ख़लीफ़ाओं ने हुकूमत की।इमाम रेज़ा (अ.) की इमामत के दौर विशेष कर मामून रशीद की ख़िलाफ़त के समय में इस्लामी दुनिया के अंदर ऐसे परिवर्तन हुए जिन्होंने शिया समुदाय के इतिहास को प्रभावित किया। इस बीच एक ओर तो लॉजिक, फ़लसफ़ा, ज्योतिष, चिकित्सा और दूसरे ज्ञानात्मक विभागों की यूनानी व ग़ैर यूनानी किताबों का अरबी ज़बान में अनुवाद हुआ जिसने इस्लामी दुनिया के समाजिक और सांस्कृतिक माहौल पर अपना प्रभाव छोड़ा और जिसके नतीजे में ज्ञानात्मक व धार्मिक चर्चा और वाद विवाद के अवसर मिले। स्पष्ट रूप से ऐसी परिस्थितियों में अत्याचारी शासन भी समाज पर ज़्यादा दबाव नहीं बना सकती हैं।ग़ैर इस्लामी किताबों का अरबी ज़बान में अनुवाद यद्धपि अब्बासी युग के पहले से शुरू हो चुका था, इतिहासकारों के कथनानुसार यह पहली बार यह काम ख़ालिद इब्ने यज़ीद इब्ने मुआविया के ज़माने में अंजाम पाया जिसे हकीमे ऑले मरवान कहा जाता था। लेकिन अमवियों के ज़माने में इस हवाले से अमवी शासकों ने किसी विशेष दिलचस्पी का प्रदर्शन नहीं किया इसके विपरीत अब्बासी ज़माने में अब्बासी शासकों ने इस पर ख़ास ध्यान दिया। पहले मंसूर के ज़माने में चिकित्सा, ज्योतिष की किताबों का अरबी में अनुवाद हुआ उसके बाद हारून ने और अधिक रूचि दिखाई और अनंततः मामून के ज़माने में इस काम को बहुत अधिक महत्व दिया गया।दूसरी ओर मामून को यह एहसास हो गया था कि अलवियों के साथ पिछले शासकों की शैली का जारी रहना अब्बासी शासन के हित में नहीं है इसलिए कि अलवियों का स्थान विशेष कर अहलेबैत (अ.) की महानता व बड़ाई सब पर स्पष्ट हो चुकी थी ऐसी परिस्थितियों में हिंसात्मक व्यवहार से अब्बासी शासन के विरूद्ध सार्वजनिक ग़ुस्से और घृणा का ख़तरा था इसी लिए वह अलवियों की सबसे महान हस्ती इमाम रेज़ा अलैहिस्सलाम से दोस्ती और प्यार अभिव्यक्ति किया करता था यहाँ तक कि ख़ेलाफ़त का भी प्रस्ताव दिया। चूँकि इमाम (अ.) उसकी नियत, इरादे और षड़यंत्र को अच्छी तरह  से जानते थे इसलिए आपने उसके प्रस्ताव को रद्द कर दिया लेकिन अनंततः मामून के बहुत ज़्यादा आग्रह पर ख़ास शर्तों के साथ उत्तराधिकार पद को स्वीकार कर लिया। उन शर्तों में से एक महत्वपूर्ण शर्त यह थी कि सरकारी मामलों से इमाम का कोई लेना देना नहीं होगा।(इमाम रेज़ा अ. द्वारा उत्तराधिकार पद को स्वीकार करने के मुद्दे के विश्लेषण के लिए "सैरी दर सीरा-ए-अइम्मा-ए-अतहार" पेज 194-243 और आयानुश्शिया भाग 2 पेज 16-17 देखें।)उत्तराधिकार पद को स्वीकार कर लेने के बाद शियों और अलवियों को अब्बासी शासन के अत्याचार और सख़्तियों से नजात मिल गई दूसरी ओर इमाम रेज़ा (अ.) और दूसरे धर्मों व समुदायों के उल्मा के बीच चर्चा और वाद विवाद से लोगों के सामने वास्तविकता और भी स्पष्ट हो गई और इस तरह शिया मूल सिद्धांतों और विचारों व दृष्टिकोणों को फैलने का अवसर मिला।कुछ लेखकों के अनुसार इस बात की भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि मामून यद्धपि हुकूमत का शौक़ीन था और सत्ता पर क़ब्ज़ा जमाने के लिए उसने अपने भाई अमीन को भी क़त्ल कर दिया था और अंत में इमाम रेज़ा (अ.) को भी शहीद किया लेकिन एतिहासिक प्रमाणों से ऐसा प्रतीत होता है कि मामून ज्ञान विज्ञान को पसंद करने वाला और तशय्यो की ओर भी रूझान रखता था। उसने न केवल यह कि इमाम रेज़ा (अ.) और दूसरे शियों के सामने अपने शिया होने का ऐलान किया बल्कि समकालीन उल्मा व बुद्धिजीवियों के साथ अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ.) की इमामत के बारे में चर्चा की है और उन्हें हराया भी है।(सैरी दर सीरा-ए-अइम्मा-ए-अतहार (अ.) पेज 200-201)इमाम रेज़ा (अ.) के ज़माने में समाजिक व राजनीतिक हिसाब से शियों के हालात संतोषजनक थे जिसका विशेष कारण यह था कि मामून तशय्यो और शियों के समर्थन का दिखावा करता था और इल्मे कलाम के उल्मा को दावत देता था कि उसके दरबार में अमीरुल मोमिनीन (अ.) की ख़ेलाफ़त से सम्बंधित चर्चा और वाद विवाद करें। मामून स्पष्ट प्रमाणों और सबूतों द्वारा अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ.) की ख़ेलाफ़त के विरोधियों के दावों को ग़लत सिद्ध करता था लेकिन इमाम रेज़ा (अ.) को शहीद करने के बाद मामून ने यह सिलसिला पूरी तरह से बंद कर दिया।(तारीख़ुश्शिया पेज 54, आयानुश्शिया भाग 2 पेज 15-16 पढ़े।)इमाम रेज़ा (अ.) की शहादत के बाद आपके बेटे इमाम मुहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम ने इमामत की बागड़ोर अपने हाथ में ली। 195 हिजरी में आपका जन्म हुआ और पच्चीस साल के  आयु में 220 हिजरी में शहादत पाई। आपके ज़माने में मामून और मोअतसिम दो अब्बासी ख़लीफ़ा हुकूमत कर रहे थे। मामून 218 हिजरी में दुनिया से गया इस तरह इमाम मुहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम की इमामत के पंद्रह साल मामून की हुकूमत के दौर में गुज़रे। मामून ने इमाम मुहम्मद तक़ी (अ.) के साथ भी वही नीति जारी रखी जो आपके  पिता के साथ रखता था। इमाम (अ.) को मदीने से बग़दाद बुलाया आपका बड़ा सम्मान करता था, अपनी बेटी उम्मे फ़ज़्ल की शादी भी आप से कर दी। चूँकि अब्बासी इस शादी के विरूद्ध थे इसलिए मामून ने मशहूर उल्मा को दावत दे कर एक ज्ञानात्मक सभा का आयोजन किया और तय पाया कि यहिया इब्ने अकसम जो उस युग का सबसे बड़ा विद्धान था, इमाम (अ.) से कठिन से कठिन सवाल पूछे ताकि इमाम (अ.) की श्रेष्ठता व महानता उन पर स्पष्ट हो जाए। इसलिए इल्मी सभा आयोजित की गई यहिया इब्ने अकसम ने सवाल किया। जवाब में इमाम (अ.) ने यहिया से प्रश्न का विवरण पूछा तो यहिया दंग रह गया और सब पर इमाम (अ.) की श्रेष्ठता स्पष्ट हो गई।(अल-इरशाद भाग 2 पेज 281-287)कुछ समय के बाद इमाम मदीने चले गए और 218 हिजरी में मोअतसिम अब्बासी के सत्ता पर क़ब्ज़ा ज़माने तक आप मदीने में ही रहे। जब मोअतसिम ने हुकूमत हासिल की तो दोबारा इमाम (अ.) को मदीने से बग़दाद बुला लिया और अनंततः आपकी बीवी उम्मे फ़ज़्ल द्वारा ज़हेर दिलाकर आपको शहीद कर दिया। मोअतसिम शियों को इमाम (अ.) के अंतिम संस्कार से रोकना चाहता था लेकिन शियों की बड़ी संख्या गले में तलवारें लटका के सामने आ गई और उन्होंने इमाम (अ.) का अंतिम संस्कार किया और आपके पाक शरीर को दफ़्ना दिया।
(तारीख़ुश्शिया पेज 57)
इस घटना से पता चलता है कि उस ज़माने में बग़दाद में शियों की संख्या ठीक ठाक थी दूसरी ओर राजनीतिक व समाजिक हालात भी ऐसे नहीं थे कि अब्बासी ख़लीफ़ा ताक़त का प्रदर्शन करते। इसी तरह बड़े स्तर पर इमाम जवाद (अ.) से विभिन्न अवसरों पर विभिन्न तरह के धार्मिक सवाल किए जाने से भी इस सच्चाई का पता चलता है कि उस ज़माने में भी शियों के लिए हालात समाजिक व राजनीतिक हिसाब से बहुत हद तक शांतिपूर्ण थे।मोअतसिम के शासन का सिलसिला 227 हिजरी तक जारी रहा उसके बाद उसका बेटा वासिक़ बिल्लाह ने हुकूमत संभाली।232 हिजरी में वासिक़ बिल्लाह की मौत के बाद सत्ता की बागडोर मुतवक्किल के हाथों में आ गई। मोअतसिम और वासिक़ के ज़माने में शियों के हालात में कोई ख़ास परिवर्तन नहीं आया और न ही कोई महत्वपूर्ण घटना घटी और वह दोनों मामून की शैली पर ही हुकूमत करते रहे। कुछ इतिहासकारों के अनुसार वासिक़ जनता विशेष कर हाशमियों के साथ अपेक्षाकृत अच्छा व्यवहार रखता था उसने बड़ी मात्रा में धन दौलत लोगों में बांटी। (तारीख़े याक़ूबी भाग 2 पेज 445)धार्मिक दृष्टिकोण के हिसाब से वासिक़ मोतज़ेली दृष्टिकोण से प्रभावित था। मुख्य न्यायाधीश अहमद इब्ने अबी दाऊद मोतज़ेली का सत्ता में प्रभाव बहुत ज़्यादा था। मामून के ज़माने में इल्मे कलाम का एक मुद्दा "क़ुरआन का क़दीम या हादिस होना" विचाराधीन था और चर्चा अपने चरम पर थी।(क़दीम अर्थात प्राचीन, जो पहले से रहा हो और हादिस अर्थात नवोतपन्न जो पहले न रहा हो वाद में वुजूद में आया हो।) मोतज़ेला पूरे बल के साथ क़ुरआन के हादिस होने को मानते थे जब कि अहले हदीस और हम्बली क़ुरआन के हादिस होने को पूरी तरह से ग़लत जानते थे। इस मुद्दे पर दोनों गुटों के बीच बहुत ज़्यादा  बहसें और झड़पें हुईं। वासिक़ के ज़माने में सरकारी कर्मचारी इस मुद्दे पर लोगों के दृष्टिकोणों के बारे में छानबीन करते और सरकारी व धार्मिक पद केवल उन्हीं लोगों के हवाले किए जाते जो क़ुरआन को हादिस मानते हों। इसीलिए इस युग को ”संकट का युग" कहा जाता है।क़ुरआन मजीद और अल्लाह के कलाम (बोली) के हादिस होने का दृष्टिकोण यद्धपि सही और अहलेबैत (अ.) के दृष्टिकोण के अनुसार है लेकिन चूँकि इस मुद्दे को राजनीतिक रंग दे दिया गया था और अब्बासी शासक तथा मोतज़ेली मुतकल्लिमों ने उसे राजनीतिक व समाजिक उद्देश्य हासिल करने का माध्यम बना रखा था इसलिए इमाम (अ.) इस चर्चा से बचते थे लेकिन उचित अवसर पर क़ुरआन के हादिस होने के बारे में अपना दृष्टिकोण बयान करते रहते थे।कुल मिलाकर मामून, मोअतसिम और वासिक़ के ज़माने में शियों के लिए पिछले और बाद के युग से बेहतर राजनीतिक व समाजिक हालात थे और उन पर सख़्ती और दबाव कम था लेकिन मुतवक्किल अब्बासी की हुकूमत आते ही स्थिति बिल्कुल उलट गई। उसके ज़माने में अहलेबैत (अ.) और शियों पर सख़्ती व संकट, अत्याचार व हिंसा और दुश्मनी को बढ़ावा मिला।मुतवक्किल की ओर से दुश्मनी और घृणा का ऐसा प्रदर्शन देखने को मिला कि उसने इमाम हुसैन (अ.) की क़ब्र का निशान तक मिटाने का हुक्म दे दिया और ज़ियारत पर पाबंदी लगा दी गई।(तारीख़ुल ख़ुल्फ़ा पेज 347)इसी तरह उसने अपनी संतानों मोअतज़ व मोअय्यद के उस्ताद इब्ने सिक्कीत को केवल इस अपराध में क़त्ल करदिया कि इब्ने सिक्कीत इमाम हसन (अ.) व इमाम हुसैन (अ.) को उसके बेटों से सर्वोत्तम व सर्वश्रेष्ठ मानते थे। एक दिन मुतवक्किल ने इब्ने सिक्कीत से पूछा मेरे बेटे तुम्हें ज़्यादा प्यारे हैं या हसन (अ.) व हुसैन (अ.)? इब्ने सिक्कीत ने जवाब दियाः हसन (अ.) व हुसैन (अ.) से किया मुक़ाबला!!! अली इब्ने अबी तालिब (अ.) का दास क़म्बर भी तुम्हारी संतानों से सर्वोत्तम है। यह  सुन कर मुतवक्किल ग़ुस्से में आ गया और इब्ने सिक्कीत को क़त्ल करने का  आदेश जारी कर दिया।(तारीख़ुल ख़ुल्फ़ा पेज 348)उस समय इमाम अली तक़ी अ. इमाम के पद थे। पिता की शहादत के बाद इमामत की ज़िम्मेदारी आपके काँधों पर आ गई थी और आप तैंतीस साल तक इस महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी को अच्छी तरह से निभाते रहे।इमाम अली तक़ी अलैहिस्सलाम की इमामत के बीच मोअतसिम, वासिक़, मुतवक्किल, मुंतसिर, मुस्तअईन और मोअतज़ अब्बासी की हुकूमत रही। मुतवक्किल ने इमाम (अ.) को 236 हिजरी में मदीने से अपनी राजधानी सामर्रा बुला लिया ताकि  आप पर पूरी तरह से कंट्रोल रखा जा सके। इसके बावजूद कभी कभी मुतवक्किल के जासूस यह ख़बर उसके पास पहुँचाते रहते कि शियों की आवगमन आपके यहाँ बहुत ज़्यादा है शिया आपके यहाँ हथियार जमा कर रहे हैं और आप हुकूमत के विरूद्ध आंदोलन करने वाले हैं, मुतवक्किल अपने सैनिकों को भेज कर छापामार कार्यवाही करवाता और तलाशी के बाद मालूम होता कि यह ख़बरें ग़लत हैं। कुछ इतिहासकारों के अनुसार एक दिन शराब की सभा सजी थी मुतवक्किल ने उसी शराब की सभा में इमाम (अ.) को लाने का आदेश दिया इमाम (अ.) आए लेकिन आपने ऐसी बातें कहीं कि पूरी सभा प्रभावित हो गई यहाँ तक कि मुतवक्किल भी आंसू बहाने और अपने किए पर पछताने लगा।(मुरूरुर ज़हब भाग 4 पेज 11,  आयानुश्शिया भाग 2 पेज 83, तारीख़ुश्शिया पेज 60)मोअतज़ अब्बासी के ज़माने में इमाम अली तक़ी (अ.) की शहादत हो गई और आपके बाद इमामत की ज़िम्मेदारी इमाम हसन असकरी अ. के काँधों पर आ गई। इमाम हसन असकरी (अ.) की इमामत की अवधि छः साल थी (254-260 हिजरी) इस 6 साल में मोअतज़, महदी और मुतवक्किल का बेटा मुस्तअईन, अब्बासी शासकों की हुकूमत रही। इमाम हसन असकरी (अ.) अपने पिता के साथ मुतवक्किल के आदेश से मदीने से सामर्रा स्थांनतिरित हुए थे उस समय से शहादत तक आप सामर्रा के “असकर” नामक मुहल्ले में सैनिक छावनी में रहे।अब्बासी शासन के कर्मचारी इमाम हसन असकरी (अ.) पर कड़ी निगाह रखते थे। लोगों के दिलों में इमाम (अ.) के आध्यात्मिक प्रभाव से डर व दहशत के अतिरिक्त उन्हें आपके उस बेटे के वुजूद से भी बहुत ज़्यादा ख़तरा था जो हदीस के अनुसार दुनिया में आकर अत्याचार का पूरी तरह सफाया कर देगा और दुनिया में न्याय व इंसाफ़ का सिस्टम लागू करेगा। उल्लिखित कारणों से इमाम हसन असकरी (अ.) का जीवन बहुत सख़्त हालात में गुज़रा और शियों से आपका सम्पर्क बहुत मुश्किल था लेकिन इमाम (अ.) के विश्वसनीय और संतोषजनक वकील इस्लामी दुनिया के विभिन्न केंद्रों में बसे हुए शियों की मुश्किलों और धार्मिक मुद्दों को हल करते रहते थे उस ज़माने में क़ुम भी शियों का एक केंद्र था और इस शहर में अहमद इब्ने इस्हाक़ इमाम हसन असकरी (अ.) के वकील थे।इमाम हसन असकरी (अ.) की शहादत के साथ ही बारहवें इमाम हज़रत महदी मौऊद अज्जलल्लाहो तआला फ़रजहुश्शरीफ़ की इमामत शुरू हो गई और शिया समुदाय का इतिहास एक नए चरण में प्रवेश कर गया। इमामे ज़माना (अ.) की इमामत की शुरूवात वास्तव में इमामत के ग़ैबत का आरम्भ था। उस समय से अब तक शियों में अनगिनत परिवर्तन व तबदीलियां और उतार व चढ़ाव आए यहां पर उन्हें बयान करने का समय नहीं है।


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