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Date of publication : 11/9/2016 21:6
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अरफ़े के दिन का महत्व...

अरफ़ात की भूमि पर हाजी अल्लाह से प्रार्थना और पापों का प्रायश्चित करते हैं। यह वह भूमि है जिससे हज़रत आदम अलैहिस्सलाम, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम की यादे जुड़ी हुई हैं।

विलायत पोर्टलः अरफ़ात की भूमि पर हाजी अल्लाह से प्रार्थना और पापों का प्रायश्चित करते हैं। यह वह भूमि है जिससे हज़रत आदम अलैहिस्सलाम, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम की यादे जुड़ी हुई हैं। यह हाजियों के लिए विशिष्ट अवसर हैं कि वे अपने पापों का प्रायश्चित करें और अगले दिन मिना के संस्कार के लिए तय्यार हों। 9 ज़िलहिज्ज का अलग ही माहौल होता है। यद्यपि क़ुरबानी 10 ज़िलहिज्ज को होती है लेकिन ऐसा लगता है कि अल्लाह की कृपा की समीर एक दिन पहले ही बहना शुरु हो जाती है जिसे अरफ़ा का दिन कहते हैं। अरफ़ा का अर्थ है पहचान। वह पहचान जिसमें सोच-विचार हो और इस्लाम में सोच-विचार पर बहुत ज़्यादा ज़ोर दिया गया है। अरफ़ा का दिन अल्लाह और उसकी अनुकंपाओं को बेहतर से बेहतर ढंग से पहचानने का दिन है। यह अल्लाह का विशेष दिन है जिसे सही ढंग से उपयोग करने पर बहुत ज़ोर दिया गया है। अरफ़ा के दिन अल्लाह से प्रार्थना इस दिन का सबसे महत्वपूर्ण व सर्श्रेष्ठ  कर्म है। यूं तो अल्लाह से हर समय संपर्क किया जा सकता है लेकिन कुछ समय और स्थान ऐसे हैं जहां यह संपर्क बेहतर ढंग से होता है और इसका नतीजा भी अच्छा निकलता है और अरफ़ा को भी उन्हीं समय व स्थान में गिना जाता है। पैग़म्बरे इस्लाम के परपौत्र हज़रत इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं, “जो दुआ करना चाहते हो करो। यह पवित्र दिन अल्लाह से पापों की क्षमा मांगने का दिन है। यहां तक कि अरफ़ा के दिन दूसरे कर्मों पर भी दुआ व पापों की क्षमा का प्रभाव पड़ता है।” 9 ज़िलहिज्ज के दिन पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के हवाले से बहुत सी दुआएं और संस्कार उद्धरित हुए हैं ताकि इस पवित्र दिन से ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा उठा सकें। इस दिन रोज़ा रखना, स्नान करना, विभिन्न प्रकार की नमाज़ और दुआएं पढ़ने पर ज़ोर दिया गया है। इस दिन पैग़म्बरे इस्लाम की दुआ का एक भाग इस तरह है, “हर बुराई से पाक अल्लाह का नरक पर अधिकार है। हर बुराई से पाक अल्लाह की स्वर्ग में अनुकंपाएं फैली हुई हैं। हर बुराई से पाक अल्लाह का न्याय प्रलय के दिन ज़ाहिर होगा।” इस दिन सबसे व्यापक व मन को सुकून देने वाली दुआ का नाम दुआए अरफ़ा है जिसे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अरफ़ात के मरुस्थल में पढ़ी थी। इस दुआ में अध्यात्म के बहुत गहरे अर्थ मौजूद हैं। इसी तरह पैग़म्बरे इस्लाम के दूसरे परपौत्रों ने भी अरफ़ा के दिन की अहमियत पर ज़ोर दिया है और इस दिन से विशेष दुआएं बताई हैं। इस बात में शक नहीं कि जो लोग हज के लिए गए हैं उनके लिए अरफ़ा का दिन बहुत ही अध्यात्मिक दिन है। वे अपना हज व्यवहारिक रूप से इस दिन अरफ़ात के मरुस्थल में गुज़ार कर शुरु करते हैं। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अरफ़ात के मैदान में जो मक्के से बाहर है, हाजियों के ठहरने का कारण इन शब्दों में बयान किया है, “अरफ़ात हरम की सीमा से बाहर है और अल्लाह के मेहमानों को चाहिए कि दरवाज़े के बाहर इतना गिड़गिड़ाएं कि प्रवेश के योग्य हो जाएं।” इसी प्रकार हज़रत अली अलैहिस्सलाम अरफ़ात के मैदान की अहमियत के बारे में कहते हैं, “कुछ गुनाहों के प्रभाव इतने गहरे होते हैं कि वे सिर्फ़ अरफ़ात के दिन ही माफ़ किए जाते हैं।” यही कारण है कि इस मरुस्थलीय किन्तु पवित्र भूमि में हाजी अल्लाह से क्षमा की बहुत आशा रखते हैं।  हरम पवित्र काबे के आस-पास के उस क्षेत्र को कहते हैं जहां हाजियों पर छोटे से छोटे प्राणि को कष्ट देना वर्जित है। पैग़म्बरे इस्लाम का एक कथन है, “जब लोग अरफ़ात में ठहरते हैं और अपनी मांग को गिड़गिड़ा कर पेश करते हैं तो अल्लाह फ़रिश्तों के सामने इन लोगों पर गर्व करता है और उनसे कहता है, क्या नहीं देखते कि मेरे बंदे बहुत दूर से गर्द में अटे मेरे पास आए हैं। अपना पैसा मेरे मार्ग में ख़र्च किया है और अपने शरीर को थकाया है? मैं अपनी शाम की क़सम खाता हूं कि उन्हें इस तरह पाप से पवित्र कर दूंगा जिस तरह वे मां के पेट से पैदा होते हैं।” यही कारण है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम बल देते हैं, “अरफ़ात में वह व्यक्ति सबसे बड़ा पापी है जो वहां से लौटे और यह ख़्याल करे कि उसे क्षमा नहीं किया गया है।” इस तरह हाजी हज के पहले दिन अरफ़ात के मैदान में पापों से पवित्र हो जाते हैं ताकि हाजी बनने के योग्य हो सके। अरफ़ात मेना पहुंचने का पास है। क्योंकि मेना में हाजी तीन दिन ठहरने के दौरान शैतान को कंकरी मारते हैं और शैतान तथा अपने वजूद से सभी शैतानी प्रतीकों को दूर करते हैं। यही कारण है कि अरफ़ा का दिन हाजियों के लिए बहुत अहमियत रखता है। वे सांसारिक चिंताओं से दूर, अपने पालनहार से संपर्क बनाकर उससे पापों की क्षमा मांगते हैं। पिछले साल भी बड़ी संख्या में हाजी सफ़ेद कपड़े पहने हुए अरफ़ता के मैदान में अल्लाह से प्रार्थना में लीन थे। उन्होंने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की इस दिन की विशेष दुआ पड़ी और सूर्यास्त के समय वे मशअरुल हराम जाने के लिए तय्यार हुए और फिर मेना गए। लेकिन उन्हें इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि मेना में कैसी त्रासदी घटने वाली है। अलबत्ता इस ओर चिंता करने का कोई कारण भी नहीं था क्योंकि विगत की तुलना में हाजियों की संख्या बहुत कम हो गई थी और थोड़े सोच-विचार व सही प्रबंधन से हज का बेहतरीन ढंग से आयोजन हो सकता था लेकिन चूंकि आले सऊद में हज के सही आयोजन की क्षमता नहीं है तो हज के मौक़े पर हमेशा किसी न किसी त्रासदी का खटका लगा रहता है। अरफ़ात के गर्म मरुस्थल में ठहरने और फिर वहां से मशअरुल हराम जाने तक हाजी बहुत थक जाते हैं। सिर्फ़ अल्लाह से आस्था ही हाजियों को क़ुरबानी के दिन मिना और शैतान को पत्थर मारने के स्थल की ओर ले जाती है। उन्हें अल्लाह के वादे पर यक़ीन है कि अरफ़ात में उनके सारे पाप धुल गए हैं और अब उन्हें शैतान और उसके चेलों से दूरी बनानी चाहिए ताकि अल्लाह की कृपा के पात्र बनें। पिछले साल भी हाजी पूरे हर्षोल्लास के साथ मिना पहुंचे और शैतान को कंकरी मारने के स्थल की ओर रवाना हुए लेकिन सऊदी अरब के अयोग्य कर्मचारियों ने बड़ी संख्या में हाजियों को ऐसे रास्ते की ओर जाने के लिए कहा जिसका अंतिम सिरा बंद कर रखा था। न सिर्फ़ यह कि बाहर निकलने का मार्ग बंद था बल्कि दूसरे मार्ग से भी हाजी उस तंग मार्ग में दाख़िल हो रहे थे। मानो उनके लिए कोई जाल बिछाया था। भीड़ बढ़ने से लोग पिसने लगे और ऊपर से सूरज की तेज़ गर्मी के कारण हाजियों में ताक़त ख़त्म हो गयी और वे एक के बाद एक पतझड़प के पत्तों की तरह गिरने लगे और हज को अंजाम देने की अपनी सबसे बड़ी इच्छा को पूरा न कर सके किन्तु इस बात में शक नहीं कि मिना त्रासदी में 7000 से ज़्यादा मरने वालों का अल्लाह के निकट उच्च स्थान है। जैसा कि पवित्र क़ुरआन में अल्लाह कहता है, “जो व्यक्ति अपने घर से अल्लाह, उसके पैग़म्बरे के लिए और रास्ते में मौत आ जाए तो इसका पारितोषिक अल्लाह के ज़िम्मे है और अल्लाह क्षमाशील व कृपालु है।” यद्यपि मेना में हाजियों की मौत बड़ी दर्दनाक  थी किन्तु अल्लाह के निकट उनका बहुत ऊंचा स्थान है। लेकिन पिछले साल मेना त्रासदी की बलि चढ़ने वालों के उच्च स्थान का अर्थ यह नहीं है कि इस घटना के संबंध में अयोग्य आले सऊद शासन का दामन हल्का हो जाएगा। इसी प्रकार इस शासन को पिछले साल हज़ारों की संख्या में मरने वाले हाजियों के संबंध में जवाब देना होगा। आले सऊद शासन अनेक बार यह दर्शा चुका है कि उसमें हज जैसे आध्यात्मिक संस्कार के आयोजन की योग्यता नहीं है बल्कि वह हज के आयोजन के ज़रिए अपनी छवि को अच्छी दिखाने की कोशिश करता है। यही कारण है कि दिन प्रतिदिन उन लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है जिनका मानना है कि हज के संचालन के लिए इस्लामी देशों की एक परिषद गठित हो और वही हज का संचालन संभाले। इस साल हज के अवसर पर मुसलमानों की एक महत्वपूर्ण दुआ यह है कि उनके पवित्र स्थल जिसमें मक्का, मदीना, और क़ुद्स शामिल हैं, अत्याचारी शासनों के चंगुल से आज़ाद हों। ................तेहरान रेडियो


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