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Code : 183367
Date of publication : 10/9/2016 9:28
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इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ) का इल्म।

इमामों की ज़िंदगी का विश्लेषण करते समय इस प्वाइंट को ध्यान में रखा जाए कि मासूम के यहाँ ज़िंदगी के तौर तरीके और लोगों के साथ मिलने जुलने के लिहाज से कोई अंतर नहीं पाया जाता है एकमात्र अंतर जो उन लोगों के बीच नज़र आता है वह सेचुएशन में अंतर (Situational Difference) है इसलिये कि हर ज़माने में नए और विभिन्न मुश्किलें वुजूद में आती है और विचार व राजनीतिक ज़रूरतें भिन्न होती हैं जबकि मक़सद समान होते हैं,.............


विलायत पोर्टलः इमामों की ज़िंदगी का विश्लेषण करते समय इस प्वाइंट को ध्यान में रखा जाए कि मासूम के यहाँ ज़िंदगी के तौर तरीके और लोगों के साथ मिलने जुलने के लिहाज से कोई अंतर नहीं पाया जाता है एकमात्र अंतर जो उन लोगों के बीच नज़र आता है वह सेचुएशन में अंतर (Situational Difference) है इसलिये कि हर ज़माने में नए और विभिन्न मुश्किलें वुजूद में आती है और विचार व राजनीतिक ज़रूरतें भिन्न होती हैं जबकि मक़सद समान होते हैं, इमाम हसन अ. की सुलह और इमाम हुसैन (अ) के आंदोलन के मक़सद एक ही थे तरीके यानी स्ट्राटेजी (Strategy) अलग थी।शिया इमामों के व्यक्तित्व व सीरत की स्टडी के सिलसिले में उनके इल्म, आध्यात्मिक आर राजनीतिक जिंदगी की समीक्षा करना जरूरी है। हज़रत रसूले इस्लाम स.अ के बाद अमीरुल मोमिनीन ने मस्जिदे कूफ़ा के मिम्बर से बार बार कहाः "" سلونی قبل ان تفقدونی""  सलूनी सलूनी क़बला अन तफ़क़ेदून" (पूछ लो मुझसे जो कुछ पूछना हो इससे पहले कि तुम मुझे खो दो)। हसन बिन अली अलैहिस्सलाम को मुआविया हुकूमत ने लगातार दबाव में रखा, इमाम हुसैन ने यज़ीदी हुकूमत की शरीयत के खिलाफ कार्रवाई को स्वीकार करने से इंकार किया और शहादत को क़ुबूल किया, इन हालात में करबला के बाद इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) ने कुरान के आदेशों को दुआ और मुनाजात के सांचे में ढाल कर इसका इज़हार क्या, इमाम सज्जाद की शहादत (95 हिजरी) के बाद इमाम बाक़िर को 19 साल का समय मिला (114 हिजरी तक) इस समय में चूंकि बनी उमय्या और बनी अब्बास में संघर्ष हो रहा था, तो इमाम बाक़िर (अ) के लिए ऐसे बेहतर हालात पैदा हो कि वह लोगों को इल्म के रास्ते पर लगा सके।यह इमाम बाक़िर (अ) का हम पर बहुत बड़ा एहसान है कि उन्होंने हमें इल्म व तरबियत, शिक्षा व प्रशिक्षण और शरीयत के स्थान के महत्व का एहसास दिलाया।इसका नतीजा यह निकला कि लोगों के रुझान अहलेबैत अ.ह की ओर बढ़ते ही गए और लगभग 4 हजार लोग आपके क्लास में शिरकत करने लगे।इमाम बाक़िर (अ) के इस अहेम व बेसिक काम के वजह से भविष्य में इमाम सादिक़ को फ़िक़्ह, तफ़सीर और नैतिक मुद्दों पर संकलन का मौका मिला जो आज फ़िक़्हे जाफ़री के लिए एक मूल्यवान संपत्ति है। शिक्षा से संबंध के कारण इमाम सज्जाद अ. ने सहीफह कामेला द्वारा दुआओं के रूप में एक पाठ्यक्रम या (Curriculum) बनाया, इसको एक व्यापक रूप में इमाम बाक़िर ने अपनी  शिक्षा में शामिल किया जिसे अंततः इमाम सादिक़ (अ) ने जामिया या युनीवर्सिटी के कल्चर से परिचित कराया।


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