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Date of publication : 25/8/2016 19:11
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क्या शिया मज़हब कर्बला की घटना के बाद वुजूद में आया?!!!

निसंदेह कर्बला की घटना शिया समुदाय की राजनीतिक व आध्यात्मिक ज़िंदगी का महत्वपूर्ण मोड़ है लेकिन ख़ुद यह घटना (ख़ास कर इमाम हुसैन (अ.ह) और आपके अस्हाब के सम्बंध से) उन्हीं शिया मूल तत्वों व दृष्टिकोणों का नतीजा है जिनकी शुरूआत रसूले इस्लाम अ. के ज़माने से हो चुकी थी और जो 61 हिजरी तक विभिन्न इतिहासिक चरणों से गुज़र चुके थे................


विलायत पोर्टलः पिछले दृष्टिकोण के बारे में पेश किए गए विश्लेषण से कर्बला की घटना और इमाम हुसैन (अ.ह) की शहादत के बाद शिया मज़हब के वुजूद में आने के दृष्टिकोण की वास्तविकता भी पूरी तरह से स्पष्ट हो जाती है।
पढ़ें “शियों के इतिहास के बारे में ग़लत दृष्टिकोण।”
(कामिल मुस्तफ़ा अश-शैबी ने “अस-सिलतो बैनत तसव्वुफ़ वत्तशय्यो” में यही दृष्टिकोण अपनाया है, देखें अत-तशय्यो पृष्ठ 42) निसंदेह कर्बला की घटना शिया समुदाय की राजनीतिक व आध्यात्मिक ज़िंदगी का महत्वपूर्ण मोड़ है लेकिन ख़ुद यह घटना (ख़ास कर इमाम हुसैन (अ.ह) और आपके अस्हाब के सम्बंध से) उन्हीं शिया मूल तत्वों व दृष्टिकोणों का नतीजा है जिनकी शुरूआत रसूले इस्लाम अ. के ज़माने से हो चुकी थी और जो 61 हिजरी तक विभिन्न इतिहासिक चरणों से गुज़र चुके थे।एक लेखक ने कर्बला की घटना के बाद शिया समुदाय की शुरूआत के दृष्टिकोण की समीक्षा करते हुए तशय्यो के निम्नलिखित तीन चरणों को बयान किया है, लेखक के अनुसार तशय्यो का तीसरे और मौलिक चरण की शुरूआत कर्बला की घटना के बाद ही हुई हैः
1.    आत्मिक व दिली तशय्योः अर्थात अली इब्ने अबी तालिब (अ.ह) से मोहब्बत करना। तशय्यो के इस चरण की शुरूआत निसंदेह पैग़म्बर (स.) के ज़िंदगी में ही हो गई थी और इसका आधार वह अनगिनत हदीसें व रिवायतें हैं जो आपकी विलायत के बारे में पैग़म्बरे इस्लाम (स.) से बयान हुई हैं जैसे हदीस यौमुद्दार (दावते ज़ुल-अशीरः) हदीसे ग़दीर आदि।
2.    राजनीतिक तशय्योः अर्थात यह विश्वास कि ख़िलाफ़त के लिए हज़रत अली (अ.ह) की योग्यता दूसरे सारे अस्हाब से ज़्यादा है। दूसरे शब्दों में अमीरुल मोमिनीन (अ.ह) की ख़िलाफ़त व इमामत का आधार नस नहीं बल्कि आपकी प्रमुखता व श्रेष्ठता थी। जैसा कि सक़ीफ़ा में यही देखने में आया।
3.    तशय्यो एक इस्लामी मज़हब के रूप मेः कर्बला की घटना के बाद तशय्यो के नाम से एक इस्लामी समुदाय वुजूद में आ गया वरना इससे पहले तशय्यो नामक कोई समुदाय नहीं था। (डाक्टर अब्दुल्लाह  इब्ने फ़य्याज़ की किताब तारीख़ुल इमामिया पृष्ठ 38-47)
पिछले दृष्टिकोण के स्पष्टीकरण और विश्लेषण के बारे में जो प्रमाण प्रस्तुत किए गए हैं उन प्रमाणों की रौशनी में इस दृष्टिकोण को भी स्वीकार नहीं किया जा सकता इसलिए कि पिछली बातों से यह बात पूरी तरह से स्पष्ट हो चुकी है कि तशय्यो की परिभाषा ख़ुद पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के ज़माने में ही मशहूर हो चुकी थी, कुछ अस्हाब इसी नाम से मशहूर थे और यह वही अस्हाब थे जिन्होंने  पैग़म्बर के बाद ख़िलाफ़त के मुद्दे में हज़रत अली (अ.ह) का समर्थन किया था। हालांकि उन्होंने केवल अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ.ह) की  श्रेष्ठता को दलील नहीं बनाया था बल्कि नुसूस (क़ुरआन व हदीस) का भी सहारा लिया था। मुहाजेरीन व अंसार में से बारह लोगों के अबू बक्र के विरोध करने से यह बात स्पष्ट रूप से सिद्ध हो जाती है।(शेख़ सदूक़ की किताब ख़ेसाल, अबाबुल इस्ना अशर, हदीस नंबर 4)
इसलिए यह दृष्टिकोण इतिहासिक और इस्लामिक वास्तविकताओं से निश्चित रूप से मेल नहीं खाता। शहीद सद्र रहमतुल्लाह अलैह ने उल्लिखित दृष्टिकोण पर टिप्पणी करते हुए लिखा हैः वास्तविकता यह है कि शिया समुदाय कभी भी आत्मा और मन में सीमित और राजनीति से जुदा नहीं रहा। तशय्यो का दृष्टिकोण पहले दिन से ही इस्लाम के दामन में मौजूद था कि शिया पैग़म्बरे इस्लाम स. के बाद मुस्लिम वर्ग के बौद्धिक, समाजिक और राजनीतिक नेतृत्व के लिए केवल हज़रत अली (अ.ह) को योग्य समझते हैं।जिन हालात में शिया समुदाय वुजूद में आया है वह ऐसी स्थित नहीं थी कि शिया दृष्टिकोण केवल आत्मिक और दिल की सीमा के अंदर सीमित रहा हो और उसमें राजनीतिक पहलू न पाया जाता रहा हो। इस सोच में शुरू से ही आत्मिक, हार्दिक और राजनीतिक दोनों पहलू एक साथ मौजूद थे।
 (नश्अतुत्तशय्यो वश्शिया पृष्ठ 91-92)



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