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Code : 183225
Date of publication : 25/8/2016 6:17
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क्या शिया मज़हब हज़रत अली अ. की ख़िलाफ़त के दौर में वुजूद में आया?!!!

कुछ लोगों के निकट तशय्यो का आरम्भ हज़रत अली (अ.ह) के शासनकाल में हुआ हालांकि उन लोगों के बीच भी मतभेद है कुछ लोगों का मानना है कि शिया मज़हब की शुरूआत का सम्बंध जमल की जंग से है और कुछ दूसरों ने सिफ़्फ़ीन की जंग से सम्बंध जोड़ा है।


विलायत पोर्टलः कुछ लोगों के निकट तशय्यो का आरम्भ हज़रत अली (अ.ह) के शासनकाल में हुआ हालांकि उन लोगों के बीच भी मतभेद है कुछ लोगों का मानना है कि शिया मज़हब की शुरूआत का सम्बंध जमल की जंग से है और कुछ दूसरों ने सिफ़्फ़ीन की जंग से सम्बंध जोड़ा है।अ) जमल की लड़ाईः इस कथन का आधार इब्ने नदीम का नज़रिया है, इब्ने नदीम अपनी किताब ”अल-फ़ेहरिस्त“ में मुहम्मद इब्ने इस्हाक़ से नक़्ल करते हैं कि जब तलहा व ज़ुबैर ने उस्मान की हत्या का बदला लेने के लिए अली अ. के विरूद्ध विद्रोह किया और हज़रत अली अ. भी उनके मुक़ाबले में आ गए ताकि उनके सरों को अल्लाह के हुक्म के सामने नमस्तक करा दें तो आपके अनुगामियों को ”शिया“ कहा जाने लगा। ख़ुद हज़रत अली अ. भी अपने समर्थकों को अपना शिया कहते थे और आपने ही शियों को चार नामों में बांटा था।1. अस्फ़िया    اصفيا
2. अवलिया    اوليا   
3. शर्तुल ख़मीस شرطة الخميس
4. अस्हाब  اصحاب
(अल-फ़ेहरिस्त पृष्ठ 249)   
इस दृष्टिकोण की समीक्षा और इसको ग़लत साबित करने के लिए कुछ तथ्यों का उल्लेख ज़रूरी है।
1.    इब्ने नदीम से पहले (इब्ने नदीम का देहांत 378 में जबकि बर्क़ी का देहांत 274 या 280 में हुआ।) अबू अब्दुल्लाहिल बर्क़ी ने इल्मे रेजाल से सम्बंधित अपनी किताब में अली (अ.ह) के अनुगामियों के चारों वर्गों या गुटों का इन्हीं शब्दों में उल्लेख किया है कि जिन शब्दों में इब्ने नदीम ने किया है, बल्कि अबू अब्दुल्लाहिल बर्क़ी ने सलमान फ़ारसी, मिक़दाद इब्ने असवद, अबूज़रे ग़फ़्फ़ारी तथा दूसरे महान अस्हाब अमीरुल मोमिनीन (अ.ह) का परिचय ”अस्फ़िया अर्थात निर्वाचित“ के रूप में किया है।(रेजाले बर्क़ी पृष्ठ 3)और चूँकि सलमान व अबूज़र का देहांत जमल की लड़ाई से पहले हो चुका था इसलिए कहा जा सकता है कि हज़रत अली (अ.ह) के अनुगामियों के लिए ”शिया “की परिभाषा जमल की लड़ाई से पहले प्रचारित और पूरी तरह से मशहूर हो चुकी थी। 2. इब्ने नदीम के कथन का पिछले दृष्टिकोण से निश्चित रूप से कोई सम्बंध नहीं है। पिछले दृष्टिकोण के प्रमाण और दूसरे प्रमाणों के दृष्टिगत इब्ने नदीम की बात को हरगिज़ स्वीकार नहीं किया जा सकता है। हो सकता है कि इब्ने नदीम का कथन अर्थ परिवर्तन या विकार का शिकार हो गया हो। 3. इस नज़रिये में केवल इतनी बात स्वीकार की जा सकती है कि शिया मज़हब हालांकि पहले से ही मौजूद था लेकिन हज़रत अली अ. के शासनकाल की राजनीतिक व समाजिक परिस्थितियों के बीच इस परिभाषा को फलने फूलने का अच्छा अवसर मिला और इस बीच शिया परिभाषा के मशहूर होने में जमल की भूमिका का इंकार नहीं किया जा सकता है।ब) सिफ़्फ़ीन की जंगः हज़रत अली (अ.ह) के शासनकाल में शिया मज़हब के वुजूद में आने और तशय्यो की उत्पत्ति के बारे में एक कथन सिफ़्फ़ीन की जंग और हकमियत के मुद्दे से सम्बंध रखता है। हकमियत की घटना के बाद अमीरुल मोमिनीन (अ.ह) के समर्थक दो गुटों में बट गए। एक गुट ख़वारिज कहलाया जो सिफ़्फ़ीन से वापसी पर कूफ़ा से पहले ”हरूरा“ नामक स्थान पर ठहर गया और दूसरा गुट वह था जो अमीरुल मोमिनीन (अ.ह) के साथ कूफ़े में दाखिल हुआ फिर इसी गुट ने इमाम (अ.ह) की  सेवा में पहुँच कर आपके हाथों पर दोबारा बैअत की और आपके दोस्तों से दोस्ती और दुश्मनों से दुश्मनी का वचन दिया।प्रसिद्ध ओरियनटालिस्ट (Orientalist) मोन्टगोमरी इसी दृष्टिकोण का मानना वाला है।(नश्अतुत्तशय्यो, पृष्ठ 37 , Watt, W.M,Islam and the integration of society, London, 1961.P.104)मानो उसका यह दृष्टिकोण भी तबरी के वाक्यांश का नतीजा है। तबरी का वाक्यांश यह हैःلمّا قدم عليّ الكوفة و فارقته الخوارج و ثبت اليه الشيعة، فقالوا في اعناقنا بيعة ثانية، نحن اولياء من واليت، و أعداء من عاديت(तारीख़े तबरी भाग 4 पृष्ठ 46)तबरी के वाक्यांश में मौजूद वाक्य  “و ثبت اليه الشيعة” स्वंय  बता रहा है कि सिफ़्फ़ीन में हज़रत अली (अ.ह) के समर्थन में जंग करने वाले ”शिया “के नाम से प्रसिद्ध थे दूसरी बैअत तो केवल पिछली बैअत को मज़बूत करने के लिए थी। इस तरह तबरी के इस वाक्य का जो मतलब निकलता है वह भी पहले और दूसरे दृष्टिकोण के बारे में प्रस्तुत किए जाने वाले प्रमाणों से पूरी तरह से मेल खाता है। सारांश यह हुआ कि सिफ़्फ़ीन की घटना भी जमल की घटना के समान तशय्यो के प्रचार और अली (अ.ह) के शियों की पहचान में प्रभावी थी न कि तशय्यो के वुजूद में आने या उसके आरम्भ में।कुछ लोग इस दृष्टिकोण को इस तरह बयान करते हैं कि सिफ़्फ़ीन की जंग के बाद जो ख़वारिज वुजूद में आए उन्होंने हज़रत अली (अ.ह) के व्यक्तित्व और इमामत के बारे में ऐसे दृष्टिकोण प्रस्तुत किए जो शियों के निकट इमामत से सम्बंधित दृष्टिकोणों से पूरी तरह से भिन्न थे। ख़वारिज ने हकमियत के निर्णय को ग़लत बताते हुए कहा कि इमाम से ग़ल्ती हो सकती है जबकि इसके विपरीत शियों का मानना है कि इमाम मासूम अर्थात निर्दोष होता है उससे ग़ल्ती की सम्भावना नहीं है। ख़वारिज ने यह ऐलान करना शुरू कर दिया कि इमाम ने अपनी इच्छा का अनुसरण करते हुए हकमियत का निर्णय लिया (मआज़ल्लाह)। जबकि शियों के निकट ”इमामत का पद इन बातों से कहीं ऊंचा है और इमाम इन चीज़ों से पाक होता है। ख़वारिज इमाम के नियुक्त किए जाने को स्वीकार नहीं करते थे और उनके निकट इमामत के लिए नस आवश्यक नहीं थी और न ही उनके हिसाब से इमाम का क़ुरैश से होना ज़रूरी था जबकि शियों का अक़ीदा इमाम के लिए नस (क़ुरआन व हदीस) और वसीयत है।उल्लिखित दृष्टिकोण का इस शैली में बयान किया जाना स्पष्ट रूप से नस (क़ुरआन व हदीस) के मुक़ाबले में इज्तेहाद के समान है इसलिए कि शियों के मूलतत्व व दृष्टिकोण पहले दिन से ही मशहूर थे और क़ुरआन व सुन्नत तथा स्पष्ट बौद्धिक प्रमाणों से हासिल किए गए हैं। उदाहरण स्वरूप कुछ प्रमाणों का उल्लेख हम पिछले लेखों में कर चुके हैं, और अधिक प्रमाण इंशा-अल्लाह आगामी चर्चाओं के संदर्भ में बयान किए जाएंगे।


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