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Date of publication : 22/8/2016 9:24
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शियों के इतिहास के बारे में ग़लत दृष्टिकोण। (1)

कुछ लेखकों के अनुसार शिया समुदाय उस्मान की ख़िलाफ़त के अंतिम दिनों में वुजूद में आया और शिया मज़हब का संस्थापक अब्दुल्लाह इब्ने सबा नामक इंसान है..........................


पिछले लेखों में हमने शिया मज़हब के आरम्भ और शिया समुदाय के इतिहास के बारे में सही दृष्टिकोण विस्तार के साथ बयान किया है जिससे स्पष्ट हो जाता है कि तशय्यो का इतिहास इस्लाम के इतिहास से जुड़ा हुआ है और ख़ुद इस्लाम के संस्थापक ने ही तशय्यो की नींव रखी है, हमने इस बात की ओर भी इशारा किया था कि शिया समुदाय की शुरूआत के बारे में कुछ लेखकों और विचारकों के दृष्टिकोण हमसे अलग हैं।
1. अब्दुल्लाह इब्ने सबा की परिकल्पना
कुछ लेखकों के अनुसार शिया समुदाय उस्मान की ख़िलाफ़त के अंतिम दिनों में वुजूद में आया और शिया मज़हब का संस्थापक अब्दुल्लाह  इब्ने सबा नामक इंसान है, इन लेखकों के अनुसार अब्दुल्लाह इब्ने सबा एक यहूदी था जो उसमान की ख़िलाफ़त के ज़माने में इस्लाम का लबादा ओढ़ कर दिखावे में मुसलमान हो गया लेकिन वास्तव में उसका असली उद्देश्य इस्लामी मूलतत्वों में परिवर्तन करना था इसलिए उसने हज़रत अली अ. की ख़िलाफ़ते बिला फ़स्ल का नज़रिया दिया और इसके साथ साथ इस्मत अर्थात निर्दोषिता को इमामत की अनिवार्य शर्त बताया।
इस तरह इमामत जो कि एक जनरल व राजनीतिक ज़रूरत थी उसमें इस्मत का रंग भर दिया। अब्दुल्लाह इब्ने सबा ने ही पिछले खुलफ़ा की ख़िलाफ़त के ग़स्वी व अधिहरण और अवैध होने की घोषणा करके लोगों को मौजूदा दौर के ख़लीफ़ा के विरूद्ध भड़काया और अनंततः विद्रोहियों के हाथों तीसरे ख़लीफ़ा क़त्ल हो गए इस तरह उन लोगों के ख़्याल में शिया मज़हब अब्दुल्लाह इब्ने सबा की ईजाद है और उसका क़ुरआन व सुन्नत, अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अ. या पैग़म्बरे इस्लाम स. के सहाबा की सीरत से कोई सम्बंध नहीं है।
(रशीद रेज़ा, अस-सुन्नः व अश-शिया पृष्ठ 4-6, अली सामी अन-नेशार ने नशअतुल फ़िकरिल फ़लसफ़ी फ़िल इस्लाम पृष्ठ 18, मुहम्मद अबू ज़ोहरा ने अल-मज़ाहिबुल इस्लामियः पृष्ठ 46, इसके अतिरिक्त कुछ ओरियनटालिस्ट भी इस दृष्टिकोण के समर्थक हैं, अधिक विवरण के लिए नशअतुत-तशय्यो पृष्ठ 50, अल-इमाम सादिक़ वल मज़ाहिबुल अरबआ भाग 4 पृष्ठ 456 से पृष्ठ 460, बुहूसुन फ़िल मेलले वन्नहेल भाग 6 पृष्ठ 127-128 को पढ़ें।)
    यह दृष्टिकोण विभिन्न कारणों से ग़लत है।
1.    इस दृष्टिकोण का नतीजा यह है कि हम इस्लामी ख़िलाफ़त को समाज की वास्तविकताओं और घटनाओं एंव हालात से अनभिज्ञ मानें या यह स्वीकार करें कि उन्हें इस्लाम व मुसलमानों की कोई चिंता ही नहीं थी या फिर जबरन यह मानना पड़ेगा कि उनमें इतनी क्षमता ही नहीं थी कि वह षड़यंत्रों का मुक़ाबला कर सकें, इसलिए उन्होंने कुछ नहीं किया। हालांकि इतिहास गवाह है कि ख़लीफ़ा और सरकारी कर्मचारी, विरोधियों के साथ बहुत कठोरता से व्यवहार करते थे चाहे वह विरोधी बड़े सहाबा ही क्यों न हों। इसलिए जनाब अबूज़र ग़फ़्फ़ारी को रबज़ह निर्वासित किया गया। जनाब अम्मार यासिर को कोड़े लगाए गए, बहुत ज़्यादा शारीरिक यातनाएं पहुँचाई गयीं, ऐसी सूरत में यह कैसे माना जा सकता है कि मुसलमानों के बीच इतना बड़ा षड़यंत्र परवान चढ़ता रहा और हुकूमत की कुर्सी पर विराजमान शासक ख़ामोश तमाशाई बने रहे? ख़िलाफ़त की ओर से उन लोगों के विरूद्ध किसी भी प्रतिक्रिया का सामने न आना क्या इस दृष्टिकोण के ग़लत होने की पुष्टि नहीं करता? क्या यह इस परिकल्पना के ग़लत व असत्य होने का प्रमाण नहीं है?
2.    उल्लिखित परिकल्पना या दृष्टिकोण न केवल यह कि ख़िलाफ़त और ख़लीफ़ा पर प्रश्न चिन्ह लगाता है बल्कि पूरे मुस्लिम वर्ग और पैग़म्बरे इस्लाम स. के सारे बड़े अस्हाब पर उंगली उठाने का अवसर प्रदान करता है। क्या वास्तव में यह स्वीकार किया जा सकता है कि पूरा मुस्लिम वर्ग एक यहूदी के षड़यंत्र से अनभिज्ञ रहा या षड़यंत्र के प्रति लापरवाही बरतता रहा और अनंततः षड़यंत्र का शिकार हो कर एक यहूदी के हाथों का खिलौना बन गया? ख़ास कर अब्दुल्लाह इब्ने सबा की कहानी में अबूज़र, अम्मारे यासिर, मुहम्मद इब्ने हुज़ैफ़ा, मुहम्मद इब्ने अबू बक्र, सअसआ इब्ने सोहान और मालिके अशतर जैसी महान हस्तियों का नाम देख कर क्या यक़ीन किया जा सकता है कि यह लोग भी उसके प्रलोभन व उपद्रव का शिकार हुए और उस्मान की हत्या तथा जमल की जंग जैसी घटनाओं को हवा देने वाले यही लोग थे !!!
3.    जिन विशेषताओं के साथ अब्दुल्लाह इब्ने सबा का उल्लेख होता है अगर वास्तव में ऐसा कोई इंसान मौजूद होता तो अलवियों के विरोधियों के कथनों या लेखों में उसका कोई बयान क्यों नहीं मिलता हालांकि विरोधियों ने अलवियों को बदनाम करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी, अगर ऐसा इंसान वास्तव में मौजूद होता या यह कहानी वास्तविकता पर आधारित होती तो निसंदेह सबसे ज़्यादा मुआविया और उसके समर्थक व सहयोगी और उसके पिठ्ठू अलवियों और शियों को बदनाम करने के लिए जगह जगह इसी कहानी का प्रचार करते दिखाई देते, लेकिन किसी इतिहासिक स्रोत में ऐसा कोई इशारा भी नहीं मिलता है।
4.    किसी भी धर्म के मानने वाले उस धर्म के संस्थापक या उसका प्रचार करने वाले महत्वपूर्णउल्मा,  विद्वानों व बुद्धिजीवियों का उल्लेख आदर व सम्मान से करते हैं और ऐसे लोगों को उस धर्म के अनुगामी हमेशा अच्छे शब्दों से याद करते हैं जब कि शिया समुदाय के महत्वपूर्ण विद्धानों व लेखकों ने जहाँ कहीं भी अब्दुल्लाह इब्ने सबा का उल्लेख किया है वहाँ या तो सिरे से अब्दुल्लाह इब्ने सबा के वुजूद का ही इंकार किया है या बुरे शब्दों और धिक्कार के साथ उसका नाम लिया है।
5.    इतिहासिक निगाह से भी अब्दुल्लाह इब्ने सबा की कहानी का केवल एक ही स्रोत है और वह है तारीख़े तबरी हालांकि इब्ने असीर, अबुल फ़िदा और इब्ने कसीर जैसे इतिहासकारों ने भी उसका उल्लेख किया है लेकिन इन सबका स्रोत तारीख़े तबरी ही है और तबरी ने भी इस कहानी को सैफ़ इब्ने उमर तमीमी द्वारा बयान किया है जो इल्मे रेजाल के उल्मा के निकट हदीस गढ़ने का आरोपी है।
(हाकिम नैशापूरी सैफ़ इब्ने उमर के बारे में कहते हैं कि उस पर नास्तिकता और विधर्मी होने का आरोप लगाया गया है। और उसकी रिवायतों का कोई मूल्य नहीं है, इब्ने मुईन उसके बारे में कहते हैं कि  उसकी हदीस ज़ईफ़ अर्थात स्वीकार योग्य नहीं हैं और उनमें कोई अच्छाई नहीं है। नेसाई ने भी उसको ज़ईफ़ बताया है। सिव्ती ने सैफ़ इब्ने उमर को ”वज़्ज़ाउल हदीस “अधिकता से हदीस गढ़ने वाला बताया है। अधिक जानकारी के देखें ”बुहूसुन फ़िल मेलले वन्नहेल भाग 6 पृष्ठ 133)
उसने इस्लामी इतिहास के बारे में दो किताबें (अल-फ़ुतूह वर्रद्दह- अल-जमल व मसीरो आयशा व अली) लिखीं है जिनमें अनगिनत निराधार और काल्पनिक बातें लिखीं हैं। अब्दुल्लाह इब्ने सबा की कहानी भी उन्हीं निराधार और काल्पनिक लेखों का एक भाग है।
6.    शिया हदीसों और मिलल व नहेल की किताबों में अब्दुल्लाह इब्ने सबा को ग़ाली और हज़रत अली (अ.ह) को ख़ुदा मानने वाला कहा गया है उन्हीं किताबों में यह भी लिखा है कि हज़रत अली अ उसके साथ बहुत सख़्ती से पेश आए और आपने पहले उसके निर्वासन फिर क़त्ल का आदेश जारी किया उसी के नाम की समानता के कारण ग़ालियों का एक समुदाय” सबीयह“ के नाम से भी जाना जाता है। स्पष्ट रूप से इन बातों का तबरी द्वारा लिखी गई अब्दुल्लाह इब्ने सबा की कहानी से कोई सम्बंध नहीं है।
सारांश यह हुआ कि अब्दुल्लाह इब्ने सबा द्वारा शिया समुदाय की ईजाद व उत्पत्ति का मुद्दा न इतिहासिक दृष्टि से सिद्ध है और न ही उसका कोई विश्वासपात्र स्रोत है। इसी के साथ यह दृष्टिकोण इतिहासिक वास्तविकता और बुद्धिसंगत आधारों से भी कोई समानता नहीं रखता है इसलिए पूरे विश्वास व दृढ़ता के साथ कहा जा सकता है कि एक गल्प से अधिक इसकी कोई वास्तविकता नहीं है।
(उल्लिखित दृष्टिकोण और अब्दुल्लाह इब्ने सबा के गल्प के बारे में निम्नलिखित किताबों का अवलोकन करें। अल्लामा काशेफ़ुल ग़ेता की किताब अस्लुश शिया व उसूलुहा, अल्लामा अमीनी की किताब अल-ग़दीर भाग 9, डाक्टर अहमद महमूद सुब्ही की किताब नज़रियातुल इमामः फ़ी इल्मिल कलाम भाग 3, डाक्टर ताहा हुसैन की किताब अलीयुन व बनूहो, अल्लामा मुर्तज़ा असकरी की किताब अब्दुल्लाह इब्ने सबा, शेख़ मुहम्मद जवाद मुग़नियः की किताब अश-शिया वत्तशय्यो, आयतुल्लाह जाफ़र सुबहानी की किताब बुहूसुन फ़िल मेलले वन्नहेल भाग 6, सय्यद तालिब ख़िरसान की किताब नश्अतुत्तशय्यो, असद हैदर की किताब अल-इमाम सादिक़ वल मज़ाहिबुल अरबआ भाग 6, हाशिम मारूफ़ हुसैनी की किताब अश-शिया बैनल अशाएरा वल मोतज़ेला पृष्ठ 121-125।)


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