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Date of publication : 21/8/2016 17:43
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अगर हम मुसलमान हैं तो हमें ऐसा होना चाहिए।

कुछ बच्चे खेल रहे थे, जैसे उनकी निगाह पैग़म्बरे इस्लाम स. पर पड़ी जो मस्जिद की तरफ़ जा रहे थे, उन्होंने अपना खेल छोड़ा और पैग़म्बर स. की तरफ़ दौड़ पड़े, उन्हें चारों ..........


विलायत पोर्टलः कुछ बच्चे खेल रहे थे, जैसे उनकी निगाह पैग़म्बरे इस्लाम स. पर पड़ी जो मस्जिद की तरफ़ जा रहे थे, उन्होंने अपना खेल छोड़ा और पैग़म्बर स. की तरफ़ दौड़ पड़े, उन्हें चारों ओर से घेर लिया। बच्चों ने देखा था कि पैग़म्बर स. अपने नवासों हसन अ. व हुसैन अ. को गोद में लेते हैं उन्हें अपने कांधों पर बिठाते हैं उनसे खेलते हैं तो उन्होंने पैग़म्बर स. के दामन को थाम लिया और ज़िद करने लगे कि हमारी सवारी बनिए!!
पैग़म्बर स. को जमाअत पढ़ाने के लिए मस्जिद पहुंचने की जल्दी थी लेकिन दूसरी तरफ़ पैग़म्बर स. यह भी नहीं चाहते थे कि छोटे छोटे बच्चों का दिल तोड़ें। बिलाल पैग़म्बर स. को ढ़ूंढ़ते हुए मस्जिद से बाहर आए तो उन्होंने पैग़म्बर स. को इस हालत में देखा, बिलाल ने बच्चों को डांटना चाहा ताकि वह पैग़म्बर स. को छोड़ दें। लेकिन जैसे ही पैग़म्बर स. की निगाह बिलाल पर गई और आपने उनके इरादे को भांप लिया और फ़रमायाः
हमारे निकट बच्चों को दुख पहुंचाने से अच्छा है कि नमाज़ में देर से पहुंचें।
फिर आपने बिलाल को हुक्म दिया कि घर जाकर बच्चों के लिए कुछ ले आएं। बिलाल गए और कुछ अखरोट लेकर आए पैग़म्बर ने उन अखरोटों को बांट दिया बच्चों ने खुशी खुशी पैग़म्बर का दामन छोड़ दिया और दोबारा अपने खेल में लग गए। (नफ़ाएसुल अख़बार पेज 286)
बच्चों पर ध्यान देना और उनकी ख़ुशी को पूरा करना प्रशिक्षण का पहला सिद्धांत है और बच्चों को राज़ी करने का सबसे आसान व पसंदीदा तरीक़ा वही पैग़म्बर की शैली है जिससे उनकी ज़रूरतें भी पूरी हों और बच्चे अपने अंदर कुछ होने का एहसास भी करें और ऐसा न हो कि वह बड़ों के रवैये से निराश होकर अपनी हस्ती ही को खो बैठें। बच्चों के साथ ऐसे पेश आना ही इस्लामी व्यवहार है। 


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