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Date of publication : 19/8/2016 10:30
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पैग़म्बरे इस्लाम स. और हज़रत अली अ. की इमामत

आपने अपने परिवार वालों को जनाबे अबू तालिब (अ.) के घर में जमा किया जिनकी संख्या प्रायः चालीस थी, जब वह लोग खाना खा चुके तो पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने उन लोगों तक ...................


हज़रत अली अ. की इमामत की दलीलें क़ुरआन व सुन्नत आदि में बहुत ज़्यादा हैं, यहां पर उन्हें विस्तार के साथ बयान नहीं किया जा सकता है, यहां हम केवल एक प्रमाण हदीसे यौमुद्दार के बयान पर ही संतोष कर रहे हैं।
हदीसों के विशेषज्ञों, इतिहासकारों और भाष्यकारों के अनुसार जब रसूले इस्लाम पर आयत
و انذر عشيرتك الاقربين
नाज़िल हुई तो आपने अपने परिवार वालों को जनाबे अबू तालिब (अ.) के घर में जमा किया जिनकी संख्या प्रायः चालीस थी, जब वह लोग खाना खा चुके तो पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने उन लोगों तक अपना संदेश पहुंचाया और फ़रमाया:
ऐ अब्दुल मुत्तलिब की संतानों! अल्लाह की क़सम अरब वासियों के बीच मैं ऐसे किसी जवान को नहीं पहचानता हूँ जो अपनी क़ौम के लिए इससे बेहतर चीज़ लाया हो जो कुछ मैं तुम्हारे लिए लाया हूँ। मैं तुम्हारे लिए ऐसी चीज़ लाया हूँ जिसमें तुम्हारी दुनिया व आख़ेरत दोनों की भलाई है, ख़ुदा ने मुझे यह हुक्म दिया है कि तुम्हें तौहीद (एकेश्वरवाद) का निमंत्रण दूँ, तुम लोगों में से जो इंसान भी इस काम में मेरी सहायता करेगा वह मेरा भाई, मेरा वसी और उत्तराधिकारी होगा।
    पैग़म्बरे इस्लाम की बात समाप्त हो गई, सब लोग ख़ामोश रहे, अचानक हज़रत अली (अ.) उठे और फ़रमाया: ऐ अल्लाह के रसूल इस काम में आपकी मदद मैं करूँगा। पैग़म्बरे इस्लाम ने हज़रत अली (अ.) के काँधे पर हाथ रख कर फ़रमायाः यह तुम्हारे बीच मेरा भाई, मेरा वसी और उत्तराधिकारी है, इसकी बात सुनो और इसका अनुसरण करो। यह सुन कर वह लोग खड़े हो गए और मज़ाक़ उड़ाते हुए जनाबे अबू तालिब (अ.) से कहने लगे: यह तुमको आदेश दे रहे हैं कि अपने बेटे का अनुसरण करो।
 (मुसनद अहमद इब्ने हंबल भाग 1 पृष्ठ 111, तारीख़े तबरी भाग 2 पृष्ठ 216, तारीख़े इब्ने असीर भाग 1 पृष्ठ 487, शरहे नह्जुल बलाग़ा इब्ने अबिल हदीद भाग 3 पृष्ठ 267, शरहे  ख़ुत्बए क़ासेआ। इस हदीस के दूसरे  स्रोतों के बारे में अधिक जानकारी के लिए अल-मुराजेआत (ख़त 20) अवलोकन करें तथा हदीस के स्रोत जानने के लिए शिया किताब ग़ायतुल मराम भाग 3 पृष्ठ 279-286  का अवलोकन करें।)
    कुछ लोगों ने इस हदीस को कमज़ोर बताते हुए कहा है किः उल्लिखित रिवायत अब्दुल ग़फ़्फ़ार बिन क़स्साम (अबू मरयम) द्वारा बयान हुई है और अहले सुन्नत के उल्मा की निगाह में यह आदमी विश्वसनीय नहीं हैं बल्कि उसकी हदीसों को स्वीकार योग्य नहीं समझा जाता है।
(तफ़सीर इब्ने कसीर भाग 5 पृष्ठ 213)
    यह एक निराधार बात है क्यूँकि यह हदीस विभिन्न स्रोंतों से बयान हुई है और केवल अब्दुल ग़फ़्फ़ार बिन क़स्साम (अबू मरयम) द्वारा ही बयान नहीं हुई है जैसा कि शेख़ सलीम बशरी मिस्री ने उल्लिखित ऐतराज़ और इस बारे में इमाम शरफ़ुद्दीन का जवाब बयान करने के बाद कहा है कि यह हदीस विभिन्न स्रोंतों में बयान हुई है। वह कहते हैं कि इस हदीस के सिलसिले में मैंने मुसनद अहमद भाग 1 पृष्ठ 111 को देखा और उसके रावियों के बारे में रिसर्च की तो मालूम हुआ कि वह सभी विश्वसनीय हैं फिर इस हदीस के दूसरे स्रोतों के बारे में रिसर्च की तो यही नतीजा निकला कि यह हदीस विभिन्न स्रोतों से बयान हुई है जिनमें हर एक दूसरे की पुष्टि करता है और अनंततः मैंने इस हदीस के सही होने पर विश्वास कर लिया।
(अल-मुराजेआत ख़त, 32। मोतज़ेलियों के एक बड़े आलिम अबू जाफ़र इसकाफ़ी ने भी इस हदीस के स्रोतों के सही होने की सपष्ट शब्दों में पुष्टि की है, देखें, शरहे नह्जुल बलाग़ा इब्ने अबिल हदीद भाग 3 पृष्ठ 276।)
    हदीसे यौमुद्दार पर दूसरी ऐतराज़ यह किया गया है कि इस हदीस को बुख़ारी, मुस्लिम और अहले सुन्नत की सही किताबों (सेहाहे सित्ता) के दूसरे लेख़कों ने भी बयान नहीं किया है।
    इसका जवाब यह है कि अगर कोई हदीस विभिन्न मान्य स्रोतों द्वारा बयान हुई हो और उसे सेहाह के लेखकों ने बयान न किया हो तो उसे हदीस के अमान्य होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता है बल्कि इससे तो वास्तविकता के जिज्ञासु पाठकों के मनों में यह सवाल उठता है कि सेहाह के लेखकों ने इतनी महत्वपूर्ण हदीस को क्यों बयान नहीं किया। इसलिए इमाम शरफ़ुद्दीन ने कहा है कि सेहाह के लेखकों ने केवल इस आधार पर इस हदीस से मुंह मोड़ लिया है कि यह हदीस ख़िलाफ़त व इमामत से सम्बंधित उनके अक़ीदे व मत के अनुसार नहीं थी इसलिए उन्होंने इसको बयान ही नहीं किया ताकि कहीं उसके द्वारा शियों के हाथों में उनके ग़लत व असत्य होने का प्रमाण न पहुँच जाए लेकिन जिन लोगों ने इस सिलसिले में पक्षपात से काम नहीं लिया है उन लोगों ने उसे अपनी किताबों में लिखा है।
     जी हाँ धार्मिक पक्षपात हज़रत अली (अ.) की इमामत व ख़िलाफ़त से सम्बंधित वास्तविकता को छुपाने का एक मौलिक कारण है, यह पक्षपात केवल इमामत से सम्बंधित हदीसों को बयान न करने में ही दिखाई नहीं देता बल्कि यह पक्षपात रिवायतों को बयान करने की शैली में भी साफ साफ दिखाई देता है। जैसा कि कुछ लोगों ने हदीस में केवल अख़ी शब्द अर्थात मेरा भाई बयान किया है और जानशीनी व ख़िलाफ़त अर्थात मेरा उत्तराधिकारी, जेसे शब्दों के बयान से बचे हैं।
    इब्ने कसीर ने इस हदीस को जहाँ तफ़सीरे तबरी से लिया है वहाँ यह कहा है: पैग़म्बरे इस्लाम ने अबू तालिब (अ.) के घर में मौजूद लोगों से सम्बोधित होकर कहाः
فأيّكم يوازرني على هذا الامر على أن يكون اخي و كذا و كذا
जो मेरी मदद करेगा वह मेरा भाई और ...... होगा। इब्ने असीर ने ख़लीफ़ा और उत्तराधिकारी का शब्द लिखने परहेज़ किया है
जबकि तारीख़े तबरी में यूँ लिखा हैः
فأيّكم يوازرني على هذا الامر على ان يكون اخي و وصييّ و خليفتي
जो मेरी मदद करेगा वह मेरा भाई और उत्तराधिरी और वसी होगा।
मुहम्मद हुसैन हैकल ने भी अपनी किताब हयाते मुहम्मद के पहले एडीशन में यह हदीस संपूर्ण रूप से लिखी है लेकिन बाद के एडीशनों में (व जानशीनी व ख़लीफ़ती मिन बअदी अर्थात मेरे बाद मेरा स्थानापन्न और उत्तराधिकारी होगा।) को मिटा दिया गया।
    हमारी इस चर्चा का नतीजा यह है कि पैग़म्बरे इस्लाम ने शुरू में ही तौहीद और इस्लाम की ओर लोगों को निमंत्रण के साथ हज़रत अली (अ.) की ख़िलाफ़त व इमामत को भी बयान कर दिया था, इस आधार पर शिया मज़बह की उत्पत्ति इस्लाम के आरम्भ से जुड़ी हुई है।


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