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Date of publication : 17/8/2016 7:52
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शिया मज़हब कब से वुजूद में आया? (2)

तशय्यो की नींव रसूले इस्लाम स. के ज़माने में ख़ुद उनके हाथों पड़ गई थी। तशय्यो अर्थात यह विश्वास कि पैग़म्बरे इस्लाम स. ने अपने बाद मुसलमानों के मार्गदर्शन व नेतृत्व का इंतेज़ाम किया है और शुरू से ही अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली अ. को इस महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी के लिए तय्यार करने लिए ख़ुद उनका प्रशिक्षण किया


पिछले लेख में हमनें बयान किया था शिया मज़हब के वुजूद में आने का पहला दृष्टिकोण यह है के शिया मज़हब रसूले इस्लाम स. के ज़माने से ही वुजूद में आ गया था।
पहला हिस्सा पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।
 शिया मज़हब कब से वुजूद में आया? (1)

दूसरा दृष्टिकोण
   शोधकर्ताओं व इतिहासकारों का एक गुट, शिया समुदाय की उत्पत्ति को पैग़म्बरे इस्लाम स. के देहांत के बाद ख़िलाफ़त व इमामत के मुद्दे में मतभेद या दूसरे शब्दों में सक़ीफ़ा बनी साएदा की घटना से सम्बंधित जानता है।
इसलिए कि पहली बार सक़ीफ़ा बनी साएदा में ही पैग़म्बरे इस्लाम स. के उत्तराधिकारी और मुसलमानों के मार्गप्रदर्शन व नेतृत्व के बारे में दो दृष्टिकोण सामने आए। अंसार के एक गुट ने साद बिन एबादः का नाम ख़िलाफ़त व इमामत के लिए पेश किया जब कि मुहाजेरीन के एक गुट ने ख़िलाफ़त के लिए अबू बक्र के नाम का समर्थन किया और दोनों गुटों के बीच बातचीत के बाद अबू बक्र के हक़ में फ़ैसला हो गया।
 उनके अलावा बनी हाशिम और कुछ अंसार व मुहाजेरीन पर आधारित मुसलमानों का एक गुट और था जो अली अ. की इमामत को मानता था इसी गुट को अली का शिया कहा गया और यहीं से शिया, इस्लाम में एक मत व मज़हब के रूप में सामने आया।
 (इब्ने ख़ुल्दून ने अपनी किताब तारीख़ भाग 3 पृष्ठ 364 में, डाक्टर इब्राहीम हसन ने तारीख़े इस्लाम भाग 3 पृष्ठ 173 में, अहमद अमीन मिस्री ने ज़ुहल-इस्लाम भाग 3 पृष्ठ 209 में गुल्गज़ीहर ने अल-अक़ीदः वश्शरीअः फ़िल-इस्लाम पृष्ठ 174 में इसी दृष्टिकोण को चयन किया है।)
तीसरा दृष्टिकोण
    इस हवाले से एक तीसरा नज़रिया भी पाया जाता है जो पिछले दो दृष्टिकोणों पर आधारित है और उन दोनों दृष्टिकोणों को एक वास्तविकता के दो हिस्से या दो चरण जानता है। इस तीसरे दृष्टिकोण के आधार पर पिछले दोनों दृष्टिकोण एक दूसरे के प्रति असंगत नहीं हैं बल्कि दोनों ने मुद्दे को एक विशेष दृष्टिकोण से देखा है और अपने अपने स्थान पर दोनों दृष्टिकोण सही और हदीसों, रिवायतों और इतिहासिक प्रमाणों से भी मेल खाते हैं। पहले दृष्टिकोण का मतलब यह है कि शिया अक़ीदे और शिया धारणा व रूचि की शुरूआत, रसूले इस्लाम स. के ज़माने में हो गई थी।
सबसे पहले जिस इंसान ने यह दृष्टिकोण पेश किया वह ख़ुद रसूले इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा स. थे। लेकिन उस ज़माने में मुसलमान, शिया और ग़ैर शिया दो संप्रदायों में बटे हुए नहीं थे। दूसरे दृष्टिकोण का नतीजा यह है कि ख़िलाफ़त व इमामत के बारे में ऐसा मतभेद जिसके कारण मुसलमान विभाजित हो गए और एक गुट ने शिया के रूप में हज़रत अली अ. की ख़िलाफ़त व इमामत को स्वीकार किया जबकि उसके मुक़ाबिले में दूसरे गुट ने अबू बक्र को पैग़म्बर का बिला फ़स्ल ख़लीफ़ा निर्वाचित कर लिया। ऐसा मतभेद पैग़म्बरे इस्लाम स. के देहांत के बाद ही सामने आया। इसलिए शिया का वुजूद भी उसी ज़माने से सम्बंधित है। स्पष्ट सी बात है कि इन दोनों दृष्टिकोणों में कोई एक दूसरे के विपरीत नहीं है और दोनों अपने अपने स्थान पर सही हैं।
    कुछ रिसर्च व शोध करने वालों ने भी इसी प्वाइंट पर अपना ध्यान केंद्रित किया है और इन दोनों दृष्टिकोणों को एक समन्वित दृष्टिकोण और संयुक्त वास्तविकता के दो पहलू या दो चरण माना है। अल्लामा सय्यद मोहसिन अमीन ने पहले यह बयान किया है शिया मज़हब व मत  पैग़म्बर के ज़माने में ही वुजूद में आ चुका था और उसी ज़माने में मुसलमानों के एक गुट को शिया कहा जाता था। उसके बाद आप लिखते हैं कि ख़िलाफ़त के बारे में मुसलमानों के बीच मतभेद के कारण शिया मज़हब सामने आया है वरना वास्तव में वह पहले से ही था। अल्लामा मोहसिन अमीन आगे कहते हैः 
    ”पिछली चर्चा से मालूम हो गया कि पैग़म्बर के ज़माने में ही मुसलमानों के एक गुट को “अली का शिया“ कहा जाता था फिर इमामत के बारे में मतभेद के नतीजे में इसका आविर्भाव हुआ इसलिए कि इस मुद्दे में अंसार ने मुहाजेरीन से कहाः हम दोनों (अंसार व मुहाजेरीन) में से इमाम निर्वाचित होना चाहिए लेकिन मुहाजेरीन ने इस प्रमाण के आधार पर कि हम पैग़म्बर के क़बीले के हैं और इमामत क़ुरैश में रहना चाहिए अंसार की बात स्वीकार नहीं की। जबकि बनी हाशिम और अंसार व मुहाजेरीन के एक गुट ने हज़रत अली की इमामत अ. को स्वीकार कर लिया यह वही शिया थे।
 (आयानुश्शिया भाग 1 पृष्ठ 23)
    हाशिम मारूफ़ हसनी भी इस बारे में लिखते हैः शिया मज़हब का मुसलमानों के एक समुदाय के हिसाब से पैग़म्बर के देहांत से पहले कोई वुजूद नहीं था लेकिन इमामत के बारे में शिया विश्वास का आधार अर्थात इमामत के चैप्टर में नस की ज़रूरत और पैग़म्बरे इस्लाम द्वारा अपने उत्तराधिकारी के रूप में अली अ. की नियुक्ति, इस्लाम के साथ पहले दिन से ही मौजूद है उसके बाद उन्होंने हज़रत अली अ. की इमामत के नुसूस व दलील बयान करने के बाद यह नतीजा निकाला है:
    शिया मज़हब, फ़ुक़्हा व मुतकल्लेमीन व हदीसों के विशेषज्ञों के निकट अपने मशहूर अर्थ और ख़ास विशेषताओं के साथ बयान की गई दलीलों के कारण रसूले इस्लाम स. के ज़माने में ही वुजूद में आ चुका था और रसूले इस्लाम स. के सहाबियों का एक गुट इस्लामी इतिहास के पहले चरण में पैग़म्बर के देहांत के बाद इसी विश्वास पर डटा रहा, ख़ुद हज़रत अली अ. ने इस्लाम व मुसलमानों के हित की खातिर उस माहौल में सहनशील नीति का चयन किया।
 (अश्शिया बैनल अशाएरा वल मोतज़ेला पृष्ठ 48-53)
     मशहूर विचारक शहीद आयतुल्लाह बाक़िर सद्र र.ह भी यही दृष्टिकोण रखते हैं, शहीद सद्र र.ह तशय्यो और शिया के बीच अंतर का नज़रिया पेश करते हुए कहते हैं कि तशय्यो की नींव रसूले इस्लाम स. के ज़माने में ख़ुद उनके हाथों पड़ गई थी। तशय्यो अर्थात यह विश्वास कि पैग़म्बरे इस्लाम स. ने अपने बाद मुसलमानों के मार्गदर्शन व नेतृत्व का इंतेज़ाम किया है और शुरू से ही अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली अ. को इस महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी के लिए तय्यार करने लिए ख़ुद उनका प्रशिक्षण किया और दूसरी ओर विभिन्न अवसरों पर विभिन्न शैलियों में मुसलमानों के सामने इस बात का ऐलान किया। अपने दृष्टिकोण के प्रमाण में शहीद सद्र र.ह ने दो प्रकार के नुसूस (क़ुरआन व हदीस से तर्क) पेश किए हैं। एक वह नुसूस व दलील जिनसे हज़रत अली अ. के प्रति पैग़म्बरे इस्लाम स. के विशेष सम्बंध और पैग़म्बर की निगाह में आपकी प्रतिष्ठा व श्रेष्ठता का पता चलता है दूसरे वह नुसूस जो पैग़म्बर के बाद हज़रत अली अ. की  इमामत व नेतृत्व को सिद्ध करते हैं।
अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अ. की श्रेष्ठता बयान करने वाले कुछ नुसूस यह हैः
1.    हाकिम नैशापूरी ने मुस्तदरक में अबू इस्हाक़ से नक़्ल किया है कि उन्होंने कहाः मैंने क़ासिम इब्ने अब्बास से सवाल किया कि किस प्रमाण द्वारा अली अ., पैग़म्बर स. के उत्तराधिकारी हो गए? उन्होंने जवाब दियाः इसलिए कि अली अ. हमेशा दूसरों के मुक़ाबिले में पैग़म्बर के साथ ज़्यादा रहते थे और हमेशा उनके साथ-साथ थे।
 (अल-मुस्तदरक अलस्सहीहैन भाग 3 पृष्ठ 136 हदीस नंबर 4632, ख़साएसे अमीरूल मोमिनीन, पृष्ठ 161)
لأنّه أوّلنا به لحوقا و أشدّنا به لزوماً
2.    अबू नईम इस्फ़हानी ने इब्ने अब्बास से रिवायत की है कि पैग़म्बर इस्लाम ने सत्तर ऐसे वचन अली अ. को दिए जिसे किसी और के हवाले  नहीं किया।
 (हिल्यतुल अवलिया भाग 1 पृष्ठ 68)
انّ النبي صلى الله عليه و آله عهد الى علي بسبعين عهدا، لم يعهد الى غيره
3.    नेसाई ने हज़रत अली (अ.) से रिवायत की है कि आपने फ़रमाया: पैग़म्बर के निकट मेरा जो स्थान था वह किसी का नहीं था, मैं हर रात पैग़म्बर की सेवा में उपस्थित होता, अगर आप नमाज़ की हालत में होते तो सुबहान अल्लाह कहते, मैं दाख़िल हो जाता और नमाज़ की हालत में न होते तो अंदर जाने की अनुमति दे देते।
 (अस-सुननुल कुबरा भाग 5 पृष्ठ 140 हदीस नंबर 8499, किताबुल ख़साएस पृष्ठ 166-167)
4.    नेसाई ने ही एक और हदीस अमीरुल मोमिनीन अ. के हवाले से बयान की है कि आपने कहाः मेरा और पैग़म्बर का ऐसा सम्बंध था कि मैं जब भी कोई सवाल करता आप जवाब देते थे और अगर सवाल नहीं करता था तो ख़ुद बातचीत शुरू कर देते थे और मालूमात से मुझे आगाह करते थे।
 (किताबुल ख़साएस पृष्ठ 170-171, इस हदीस को भी हाकिम नैशापूरी ने  मुस्तदरक में वर्णन करने के बाद कहा है कि यह शेख़ैन की शर्तों के अनुसार यह सही हदीस है।)
5.    नेसाई ने उम्मे सलमा से रिवायत की है कि अल्लाह की क़सम पैग़म्बर से सबसे अधिक क़रीब इंसान, अली (अ.) थे।
انّ اقرب الناس عهدا برسول اللّه صلى الله عليه و آله عليٌ
6.    अमीरुल मोमिनीन अ. पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के साथ अपने सम्बंधों के बारे में ख़ुत्बए क़ासेआ में फ़रमाते हैः
मैं उनके साथ इस तरह चलता था जिस प्रकार ऊंट का बच्चा अपनी माँ के साथ चलता है वह प्रतिदिन मेरे लिए अपने अख़लाक़ व व्यवहार का एक नमूना पेश करते और फिर मुझे उस पर अमल करने का हुक्म दिया करते थे।
 (नहजुल-बलाग़ा ख़ुत्बा 192)
و لقد كنت اتّبعه اتّباع الفصيل لأثر أمّه، يرفع لي في كل يوم من اخلاقه علما، و يأمرني بالاقتداء به
    ऊपर बयान की गईं हदीसें और उनके समान दूसरी रिवायतें इस सच्चाई को साबित करती हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.) को पहले दिन से ही अपने बाद  मुस्लिम उम्मत के मार्गदर्शन व नेतृत्व का पूरा ख़्याल था और इस पद के लिए अली (अ.) को  सबसे उचित इंसान समझते थे इसी लिए इस महान ज़िम्मेदारी के लिए उनका प्रशिक्षण कर रहे थे लेकिन आपने केवल इसी को काफ़ी नहीं समझा बल्कि विभिन्न परिस्थितियों व अवसरों पर आपकी इमामत  व नेतृत्व का ऐलान करते रहे। इस बारे में कुछ नुसूस उदाहरण स्वरूप हदीसे यौमुद्दार, हदीसे सक़लैन,  हदीसे ग़दीर को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है, इनके अलावा भी पैग़म्बरे इस्लाम की बहुत सी हदीसें इसको सिद्ध करती हैं।
    इस आधार पर तशय्यो कोई ऐसी नई चीज़ नहीं है कि जो इस्लाम फैल जाने के बाद विभिन्न घटनाओं के आधार पर ज़ाहिर हो गई हो बल्कि यह एक ऐसा विश्वास है कि जो इस्लाम के साथ साथ स्वाभाविक रूप से वुजूद में आया है।
    शहीद सद्र र.ह ने रसूले इस्लाम स. के बाद शिया समुदाय और मुसलमानों के बीच एक गुट के रूप में मशहूर होने के कारणों को बयान करने के बाद पैग़म्बरे इस्लाम स. की ख़िलाफ़त को बयान करते हुए इस ओर ध्यान दिलाया है कि पैग़म्बरे इस्लाम स. के सहाबा के बीच दो प्रकार के विचार प्रचारित थे, एक विचारधारा यह थी कि उनके व्यवहार व कथन के सामने हर तरह से नमस्तक रहें और इस बारे में किसी दूसरे को विचार पेश करने और तर्क वितर्क का अधिकार नहीं है। और दूसरी विचारधारा यह थी कि कुछ कामों में विशेष रूप से जिन चीज़ों का सम्बंध मुसलमानों के समाजिक जीवन से है, नस के सामने पूरी तरह से नमस्तक नहीं हुआ जा सकता है बल्कि यह लोग अपने लिए रसूले इस्लाम (स.) के व्यवहार व कथन के मुक़ाबिले में नज़रिया देने को सही समझते थे। उसके बाद उन्होंने अस्हाब के बीच इस विचारधारा के कुछ उदाहरण बयान किए हैं जिनमें, उमर बिन ख़त्ताब शीर्ष पर थे और अंत में यह नतीजा निकाला है कि रसूले इस्लाम (स.) के देहांत के बाद इस विचारधारा का नतीजा यह हुआ कि इमामत व ख़िलाफ़त के बारे में मुसलमान दो भागों में बट गए।
    एक गुट इस बारे में अपने को पैग़म्बरे इस्लाम स. के आदेशों का पाबंद नहीं समझता था, उन लोगों का सम्बंध सक़ीफ़ा से था और दूसरा गुट उन लोगों का था जो इमामत के अध्याय में अपने को पैग़म्बरे इस्लाम स. के आदेशों का पाबंद समझता था और यही लोग शिया हैं इस तरह इस्लाम में शिया मज़हब की शुरूआत हुई।
(नश्अतुत तशय्यो वश्शिया पृष्ठ 63-79)

जारी.....
तीसरा हिस्सा ज़रूर पढ़ें।



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