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Date of publication : 14/8/2016 16:11
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शिया फ़िर्क़ों पर एक निगाह।

मिलल व नहेल की किताबों में शिया समुदाय के बहुत से फ़िर्क़े और संप्रदाय बयान किए जाते हैं जैसा कि अश्अरी ने शियों को पहले तीन गुटों ग़ालिया, राफ़ेज़ा और ज़ैदिया में बांटने के बाद ग़ालियों के 15, राफ़िज़ीयों के 24 और ज़ैदियों के 6 गुट बयान किए हैं


विलायत पोर्टलः मिलल व नहेल की किताबों में शिया समुदाय के बहुत से फ़िर्क़े और संप्रदाय बयान किए जाते हैं जैसा कि अश्अरी ने शियों को पहले तीन गुटों ग़ालिया, राफ़ेज़ा और ज़ैदिया में बांटने के बाद ग़ालियों के 15, राफ़िज़ीयों के 24 और ज़ैदियों के 6 गुट बयान किए हैं। मिलल व नहेल के दूसरे लेखकों ने भी शियों के अनेक संप्रदाय बयान किए है लेकिन नीचे बयान की गईं कुछ बातों पर अगर ध्यान दिया जाए तो ऊपर किए गए नज़रिये का ग़लत होना स्पष्ट हो जाएगा।
1.    ग़ालियों को शिया कहना सही नहीं है इसलिए कि ग़ाली अहलेबैत अ. को ख़ुदा या रब और प्रतिपालक मानते हैं और ऐसा अक़ीदा व विश्वास क़ुफ़्र व शिर्क का कारण है इसी लिए मासूम इमामों अ. ने ग़ुलू करने वालों (हद से बढ़ाने वालों) को काफ़िर कहा है और सख़्ती के साथ उनसे दूरी और नफ़रत जताई है। शिया उल्मा भी ग़ालियों को काफ़िर कहते हैं और उन्हें इस्लाम से ख़ारिज बताते हैं। इस बारे में शेख़ मुफ़ीद र.ह. फ़रमाते हैः ग़ुलात इस्लाम का लबादा ओढ़े ऐसे लोगों का गुट है जो अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अ. और दूसरे इमामों अ. की ख़ुदाई या नुबूव्वत के मानने वाले हैं और मासूम इमामों अ. ने उन्हें काफ़िर और इस्लाम से ख़ारिज बताया है। (तस्हीहुल-एतेक़ाद पेज 109)
मिलल व नहेल के कुछ लेखकों ने इस बात को ध्यान रखते हुए ग़ुलात के संप्रदायों को अलग चैप्टर में “इस्लाम से सम्बंधित समुदाय के अंतर्गत बयान किया है इसलिए बग़दादी और इसफ़राइनी ने ऐसा ही किया है और ग़ालियों की गिनती शियों में नहीं की है। (अल-फ़ेरक़ बैनल फ़ेरक़ पृष्ठ 21-23, अत-तबसीर फ़िद्दीन पृष्ठ 123-147)
2.    किसी भी धर्म से जुदा होने का आधार उस धर्म के मौलिक सिद्धांत व अक़ाएद होते हैं चूँकि तशय्यो का सबसे महत्वपूर्ण और मौलिक सिद्धांत जो उसे दूसरे समुदायों पर श्रेष्ठता प्रदान करता है और उसे उनसे अलग करता है और जिसे शिया समुदाय की पहचान के रूप में देखा  जाता है वह इमामत है। इसलिए इमामत को ही विभाजन और अलग समुदाय होने का आधार होना चाहिए, दूसरे सिद्धांतों में मतभेद को शिया समुदाय की पहचान का आधार नहीं बनाना चाहिए इस आधार पर हेशामियः, यूनेसीयः, नोमानियः आदि संप्रदायों को शिया संप्रदायों के अंतर्गत बयान करना (जैसा कि मिलल व नहेल की कुछ किताबों में बयान किया गया है) सही नहीं है।
3.    इमामत में मतभेद के कारण वुजूद में आने वाले अनेक समुदाय जिन्हें मिलल व नहेल की किताबों में बयान किया गया है, मिट चुके हैं और उनकी जीवन अवधि बहुत कम थी और आज उन्हें केवल इतिहास के पन्नों में मौजूद संप्रदायों के रूप में ही देखा जा सकता है। उदाहरण स्वरूप मिलल व नहेल और इतिहास की किताबों में इमाम हसन असकरी अ. की शहादत के बाद शियों के चौदह गुटों का बयान मौजूद है, इन संप्रदायों में से आज किसी समुदाय का नाम व निशान तक मौजूद नहीं है। अगर यह मान लिया जाए कि यह समुदाय वास्तव में रहे भी होंगे तो आज पूरी तरह से ख़त्म हो चुके हैं। मिलल व नहेल की किताबों में बयान होने वाले शिया फ़िर्क़ों और संप्रदायों की ओर इशारा करने के बाद अल्लामा शेख़ तूसी र.ह फ़रमाते हैः
यह वह मतभेद हैं जो शियों के बारे में बयान किए गए हैं परन्तु इनमें से अधिकांश मतभेद ऐसे हैं जिनका मान्य किताबों में उल्लेख नहीं है और इनमें से कुछ समुदाय जैसे ग़ुलात और बातेनीयः गुट, इस्लाम से ख़ारिज हैं। (तलख़ीसुल मुहस्सिल पृष्ठ 413)
    अल्लामा तबातबाई र.ह भी  कीसानियः, ज़ैदियः, इस्मालियः, फ़तहियः और वाक़ेफ़ीयः जैसे संप्रदायों को बयान करने के बाद फ़रमाते हैः आठवें इमाम अ. के बाद से बारहवें इमाम तक जो अधिकतर शियों के निकट महदी-ए-मौऊद हैं, शियों में कोई उल्लेखनीय विभाजन नहीं हुआ और न कोई नया फ़िर्क़ा वुजूद में आया अगर कोई विभाजन हुआ भी तो वह अधिक दिनों तक बाक़ी नहीं रह सका और ख़ुद दम तोड़ गया जैसा कि इमाम अली तक़ी अ. के बेटे जाफ़र ने अपने भाई इमाम हसन असकरी अ. की शहादत के बाद इमामत का दावा किया और कुछ लोग उनके गिर्द जमा हो गए लेकिन कुछ ही दिनों के बाद उनसे दूर हो गए और जाफ़रे कज़्ज़ाब भी अपने दावे से पीछे हट गए। इसी तरह शिया उल्मा व बुद्धिजीवियों के बीच ज्ञानात्मक और धर्मशास्त्र से सम्बंधित मुद्दे तथा दूसरे मतभेद पाए जाते हैं लेकिन इन मतभेदों को धर्म के विभाजन या समुदाय बनने के रूप में नही देखना चाहिए। (शिया दर इस्लाम पृष्ठ 61)
    ऊपर बयान की गईं बातों के दृष्टिगत कहा जा सकता है कि शियों के महत्वपूर्ण फ़िर्क़ें जो मौजूद हैं और हमारे ज़माने में भी जिनके मानने वाले मौजूद हैं, वह केवल तीन गुट हैः
1)    इसना अशरी (इमामिया)
2)    ज़ैदिया 
3)    इस्मालिया।
लेकिन इमामत के नाम पर वुजूद में आने वाले कीसानियः, नाऊसियः, फ़तहियः और वाक़ेफ़ीयः जैसे समुदाय पूरी तरह से ख़त्म हो चुके हैं और मौजूदा समय में उनका नाम व निशान भी बाक़ी नहीं है।
उल्लिखित तीनों शिया समुदाय अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अ., इमाम हसन अ. और इमाम हुसैन अ. की इमामत पर सहमत हैं और उन्हें मासूम अर्थात निर्दोष इमाम और ख़ुदा व पैग़म्बर की ओर से निर्वाचित मानते हैं। लेकिन ज़ैदियः समुदाय, इमाम हुसैन अ. के बाद हसन इब्ने हसन (हसने मुसन्ना) और उनके बाद ज़ैद इब्ने अली अ. की इमामत को मानता है और इमाम ज़ैनुल आबेदीन अ. व बाक़ी अइम्मा-ए-मासूमीन अ. की  इमामत को स्वीकार नहीं करता। इसी तरह इस्मालियः समुदाय भी इमाम जाफ़र सादिक़ अ. के बाद इमाम मूसा काज़िम अ. और आपके बाद दूसरे इमामों की इमामत को नहीं मानते हैं।
और शिया इसना अशरी सभी बारह इमामों की इमामत को स्वीकार करते हैं जिन्हें रसूले इस्लाम स. ने नाम के साथ बयान किया है।


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