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Date of publication : 13/8/2016 11:57
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इमाम रेज़ा अ. की ज़ियारत का सवाब

चांद के ग्यारहवें महीने ज़ीक़ाद की 11 तारीख़ इमाम रेज़ा अ. के शुभ जन्मदिवस की तारीख़ है और इसी महीने की पहली तारीख़ को आपकी बहन हज़रत मासूमा-ए-क़ुम का जन्म हुआ। इन दोनों भाई बहन का मज़ार चूंकि ईरान में इसलिए ईरान में पूरे दस ग्यारह दिन अशरा-ए-करामत (नेकी और उदारता के दस दिन) के नाम से जश्न मनाया जाता है और एक ख़ास रंग और माहौल होता है इन दोनों हस्तियों के रौज़ों पर।


चांद के ग्यारहवें महीने ज़ीक़ाद की 11 तारीख़ इमाम रेज़ा अ. के शुभ जन्मदिवस की तारीख़ है और इसी महीने की पहली तारीख़ को आपकी बहन हज़रत मासूमा-ए-क़ुम का जन्म हुआ। इन दोनों भाई बहन का मज़ार चूंकि ईरान में इसलिए ईरान में पूरे दस ग्यारह दिन अशरा-ए-करामत (नेकी और उदारता के दस दिन) के नाम से जश्न मनाया जाता है और एक ख़ास रंग और माहौल होता है इन दोनों हस्तियों के रौज़ों पर। 
दोनों का रौज़ा बहुत ही आलीशान है, विशेषकर आठवें इमाम के रौज़े की विशालता, उसकी इस्लामी बनावट और आध्यात्मिकता देखकर इंसान वास्तव में दंग रह जाता है। सैभाग्यशाली है वह मोमिनीन जिन्हें इमाम रेज़ा अ. की ज़ियारत नसीब हो चुकी है, अल्लाह उनकी ज़ियारत को क़बूल करे और जिन्हें अब तक यह अवसर नहीं मिला है, अल्लाह उनके लिए भी ज़ियारत के रास्ते आसान करे। क्योंकि इमाम रेज़ा अ. की ज़ियारत की बहुत सिफ़ारिश की गई हैः
1.    इमाम बाक़िर अ. अमीरुल मोमिनीन अ. के हवाले से बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल स. ने फ़रमाया: खुरासान में मेरा एक दिल का टुकड़ा दफ़्न होगा, जो भी ग़म का मारा उसकी ज़ियारत को जाएगा उसकी परेशानी और ग़म दूर होगा, जो गुनहगार उसकी ज़ियारत करेगा उसे माफ़ कर दिया जाएगा। (उयूनो अख़बारिर् रेज़ा, भाग 2, पेज 257)
2.    इमाम रेज़ा अ. के एक सहाबी बज़ंती कहते हैं: आपने फ़रमाया: मेरा जो चाहने वाला भी मेरी सही पहचान के साथ मेरी ज़ियारत के लिए आएगा, मैं क़यामत के दिन उसकी शिफ़ाअत करूंगा। (अमाली-ए-सदूक़ पेज 119)
3.    शाह अब्दुल अज़ीम हसनी कहते हैं: इमाम मोहम्मद तक़ी अ. की सेवा में पहुंचा और पूछा कि मौला आपके दादा इमाम हुसैन अ. की ज़ियारत को जाऊं या आपके वालिद की? इमाम अ. ने कहा: मेरे बाबा की ज़ियारत को जाओ क्योंकि मेरे दादा इमाम हुसैन अ. के ज़ाएरीन की संख्या बहुत ज़्यादा है और उन सभी उनकी ज़ियारत को जाते हैं लेकिन मेरी बाबा की ज़ियारत केवल शिया करते हैं। (उयूनो अख़बारिर् रेज़ा, सी 2, पी 256)
4.    इमाम अली नक़ी फ़रमाते हैं: जिसकी जो हाजत है वह अपनी हाजत लेकर मेरे दादा अली इब्ने मूसा रेज़ा अ. की ज़ियारत को जाए। उसकी जो हाजत होगी पूरी होगी। इस शर्त के साथ कि किसी गुनाह की दुआ न करे (वसाएलुश्शिया, जिल्द 14, स 499)
5.इमाम सादिक अ. ने फ़रमाया: जो भी सही पहचान के साथ मेरे उस पोते की ज़ियारत करेगा जिसे खुरासान में दफ़नाया जाएगा उसका सवाब उन शहीदों के बराबर है जो रसूले ख़ुदा स. के  साथ रह कर शहीद हुए। (मन ला यहज़ोरहुल फ़क़ीह, जिल्द 2 पेज 584)
आठवें इमाम इमाम रेज़ा अ. की बारगाह जन्नत का एक टुकड़ा है, यहाँ टूटे दिलों को आराम मिलता है, यहाँ दुआएं क़बूल होती हैं, यहां मन्नतें पूरी की जाती हैं, यहां शारीरिक और आध्यात्मिक बीमारों का इलाज होता है, अल्लाह के फ़रिश्ते इमाम के ज़ाएरों का स्वागत करते हैं, यहां लोगों के भाग्य संवरते हैं।



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