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Date of publication : 11/7/2016 17:9
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शिया काफ़िर नहीं बल्कि इस्लाम का पांचवां मत हैः अलअज़हर इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी प्रमुख

अहमद तैयब से चैनल के पत्रकार ने पूछा कि क्या उनकी नज़र में शियों की आस्थाओं में को समस्या नहीं हैं? तो उन्होंने कहा कि कोई समस्या नहीं है, 50 साल पहले शैख़ शलतूत ने फ़तवा दिया था कि शिया मत, इस्लाम का पांचवां मत है और वह भी दूसरे मतों की तरह है।


विलायत पोर्टलः मिस्र और दुनिया के मशहूर इस्लामी धार्मिक संस्थान अलअज़हर इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के प्रमुख ने मिस्र के नील टीवी से बात करते हुए शिया-सुन्नी मतभेदों के बारे में बड़ी अहम बातें कही हैं। अहमद तैयब से चैनल के पत्रकार ने पूछा कि क्या उनकी नज़र में शियों की आस्थाओं में को समस्या नहीं हैं? तो उन्होंने कहा कि कोई समस्या नहीं है, 50 साल पहले शैख़ शलतूत ने फ़तवा दिया था कि शिया मत, इस्लाम का पांचवां मत है और वह भी दूसरे मतों की तरह है। पत्रकार ने पूछा कि हमारे युवा शिया हो रहे हैं, हम क्या करें? तो अहमद तैयब ने कहा कि हो जाएं, जब कोई आदमी हनफ़ी से मालेकी हो जाए तो हमें कोई समस्या नहीं होती उसी तरह से अगर ये जवान भी चौथे मत से पांचवें मत में जा रहे हैं। नील चैनल के पत्रकार ने पूछा कि कहा जाता है कि शियों का क़ुरआन अलग है, तो शैख़ ने कहा कि ये बूढ़ी औरतों की बकवास है, शियों के क़ुरआन और हमारे क़ुरआन में कोई फ़र्क़ नहीं है यहां तक कि उनकी लिखाई भी हमारी ही लिखाई की तरह है। पत्रकार ने पूछा कि एक अरब देश के 23 धर्मगुरुओं ने फ़तवा दिया है कि शिया काफ़िर हैं, इस बारे में आप क्या कहते हैं? तो अलअज़हर इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के प्रमुख ने कहा कि ये मतभेद विदेशी साज़िशों का हिस्सा है ताकि शिया और सुन्नी मुसलमानों के बीच दरार पैदा की जा सके। पत्रकार ने कहा कि मैं एक गंभीर सवाल पूछना चाहता हूं और वह यह है कि शिया अबू बक्र व उमर को नहीं मानते, ऐसे में आप उन्हें किस तरह मुसलमान कह सकते हैं? शैख़ अहमद तैयब ने उत्तर में कहा कि ठीक है वे उन्हें नहीं मानते लेकिन क्या अबू बक्र व उमर को मानना, इस्लामी आस्थाओं का हिस्सा है? अबू बक्र व उमर का मामला ऐतिहासिक है और इतिहास का धार्मिक आस्थाओं से कोई लेना देना नहीं है। इस उत्तर पर हतप्रभ हो जाने वाले पत्रकार ने पूछा कि शिया कहते हैं कि उनके इमाम एक हज़ार साल से ज़िंदा हैं, क्या ऐसा हो सकता है? उन्होंने कहा कि ऐसा मुमकिन है लेकिन इसे मानना हमारे लिए ज़रूरी नहीं है। नील चैनल के पत्रकार ने आख़िरी सवाल पूछा कि क्या यह मुमकिन है कि आठ साल का बच्चा इमाम हो? शियों का मानना है कि उनके बारहवें इमाम आठ साल में इमाम बन गए थे। अलअज़हर इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के प्रमुख ने अहमद तैयब ने कहा कि जब हज़रत ईसा झूले में पैग़म्बर हो सकते हैं तो एक आठ साल के बच्चे का इमाम होना ताज्जुब की बात नहीं है अलबत्ता हमारे लिए ज़रूरी नहीं है कि हम इस बात पर आस्था रखें लेकिन इस आस्था से इस्लाम को कोई नुक़सान नहीं पहुंचता और जो यह आस्था रखता है वह इस्लाम के दायरे से बाहर नहीं है।
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तेहरान रेडियो


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